प्राणायाम के प्रकार

सत्यार्थ प्रकाश के अनमोल वचन

      जब प्राण भीतर से बाहर निकलने लगे तब उससे विरुद्ध न निकलने देने के लिए बाहर से भीतर ले और जब बाहर से भीतर आने लगे तब भीतर से बाहर की ओर धक्का देकर रोकता जाए।

ऐसे एक दूसरे के विरुद्ध क्रिया करे तो दोनों की गति रुककर प्राण अपने वश में होने से मन और इन्द्रियां भी स्वाधीन होते हैं, बल, पुरुषार्थ बढ़कर बुद्धि तीव्र सूक्ष्मरूप हो जाती है कि जो बहुत कठिन और सूक्ष्म विषय को भी शीघ्र ग्रहण करती है। इससे मनुष्य शरीर में वीर्य वृद्धि को प्राप्त होकर स्थिर बल, पराक्रम, जितेन्द्रियता, सब शास्त्रों स्त्रों को थोड़े ही काल में समझकर उपस्थित कर लेगा। स्त्री स्त्री भी इसी प्रकार योगाभ्यास करे।

-महर्षि दयानन्द सरस्वती