व्यवस्था

व्यवस्थाओं में बंधकर ही आदमी पापी-पुण्यात्मा होता है।
मैंने तो किसी भी व्यवस्था के कोई कपड़े नहीं पहने हैं।। 2/8।।

(साभार आप्ता)

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