पुरुषार्थ

५५. पुरुषार्थ – अर्थात् सर्वथा आलस्य छोड़ के उत्तम व्यवहारों की सिद्धि के लिये मन, शरीर, वाणी और धन से जो अत्यन्त उद्योग करना है, उसको ‘पुरुषार्थ’ कहते हैं।

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