गुरु

६२. गुरु – जो वीर्यदान से लेके भोजनादि कराके पालन करता है, इससे पिता को ‘गुरु’ कहते हैं और जो अपने सत्योपदेश से हृदय का अज्ञानीरूप अन्धकार मिटा देवे, उसको भी ‘गुरु’ अर्थात् आचार्य्य कहते हैं।

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