११ वेदारम्भ संस्कार

यह उपनयन के साथ-साथ ही किया जाता है। इस संस्कार को करके वेदाध्ययन प्रारम्भ किया जाता था। इसमें बालक में सुश्रव, सुश्रवा, सौश्रवस होने तथा इसके बाद यज्ञ की विधि फिर वेद की निधि पाने की भावना होती है। यह संस्कार महान् अस्तित्व पहचान संस्कार है। इसे संस्कारों का संस्कार कह सकते हैं। इस संस्कार द्वारा बालक में आयु, मेधा, वर्चस्, तेज, यश, समिध्यस्, ब्रह्मवर्चस्, अस्तित्व, संसाधन, त्व आदि भाव जागृत किए जाते हैं। इस संस्कार में मत कर निर्देश, दोष मार्जनम्, कर निर्देश हीनांगपूर्ति तथा भाव जागृति अतिशयाधान रूप में है।

ऊपर दिए अतिशयाधान के साथ-साथ अग्नि के दिव्यदा स्वरूपों से अनेक दिव्यों की आकांक्षा करते हैं। तथा हर बालक वाक्, प्राण, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, की इन्द्रियों की परिपूर्णता के साथ-साथ इनमें यश, बल भाव आभर होने के मन्त्र ओ3म् वाक् वाक् रूप में कहता है। फिर बालक आचार्य से सम्पूर्ण चेतना अस्तित्व एवं सावित्री तीन महाव्याहृति के निकटतम कर देने की आकांक्षा करता है। आचार्य बालक से विशिष्ट शाखा विधि से गायत्री मन्त्र का तीन पदों, तीन महाव्याहृतियों या सावित्री क्रम में निम्नलिखित अनुसार पाठ कराता है। प्रथम बार- ओ3म् भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम्। द्वितीय बार- ओ3म् भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि। तृतीय बार- ओ3म् भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।।

यह पाठ धीरे-धीरे कराया जाता है। इसके पश्चात् निम्नलिखित रूप में उसका संक्षेप में अर्थ बताया जाता है। सम्पूर्ण अर्थ प्रक्रिया भी उपरोक्त त्रि टुकड़ों में सिखाने का नियम है।

ओ3म् :- ब्रह्म का श्रेष्ठ नाम इस के साथ हर नाम लग जाता है। भूः :- अस्तित्व का अस्तित्व- प्राण का प्राण। हीनांगपूर्त। भुवः :- सर्व दुःख निवारक- खराब इन्द्रियपन निवारक। दोष मार्जन। स्वः :- आनन्द दा। अतिशयाधान। सवितुः :- उत्पत्तिकर्ता, धारक, पालक, ऐश्वर्य दा। देवस्य :- सप्तर्षि- सप्त देव, सप्त ब्रह्मभाव का। प्रकाश के समान सातों का एक भाव। वरेण्यम् :- वरण करने योग्य।

तत् :- वह-यह-व्यापक तेज। धीमहि :- धारण से सिद्ध कर धी में उतारे, ध्यान सिद्ध करे। यः :- यह-वह परमात्मा। नः :- हमारी। धियः :- चित्तवृत्तियों को।

प्रचोदयात् :- प्रकृष्ट गुण, कर्म, रक्त चयापचय स्व भाव में प्रेरित करे।

उपरोक्त शाखा विधि से त्रि पाठ तथा अर्थ एक महान् अध्ययन या स्मरण योजना है। इसके प्रारूप इस प्रकार हैं। (अ) मन्त्र या बीज का ज्ञान। (ब) क्षैतिज (समानान्तर) हॉरिझोण्टल  अध्ययन। (स) ऊर्ध्व (वर्टिकल) अध्ययन। (द) तीर्यक् अध्ययन। (ई) आयतनिक अध्ययन।

इसके पश्चात् आचार्य बालक हेतु वस्त्र, संसाधन आदि की व्यवस्था करे। फिर उसे न करना, करना निर्देश पिता दे।

न करना

दुष्ट-कर्म, अधर्म, दुराचार, असत्याचरण, अन्यायाचरण एवं हर्ष-शोकादि, आचार्य के अधर्माचरण एवं कथन, क्रोध, मिथ्याभाषण, अष्टमैथुन- स्त्री-ध्यान, कथा, स्पर्श, क्रीड़ा, दर्शन, आलिंगन, एकान्तवास एवं समागम, गाना-बजाना-नृत्य (फिल्मी), गंध, अंजन सेवन, अतिस्नान, अतिभोजन, अतिनिद्रा, अतिजागरण, निन्दा, लोभ, मोह, भय, शोक, मांसभक्षण, शुष्क अन्न, धचकेदार सवारी, मर्दन, उबटन, अतितीखा, अतिखट्टा, अतिलवण एवं क्षारयुक्त भोजन, मान-सम्मान की आशा।

करना

संध्या-उपासना, भोजन पूर्व आचमन, धर्मक्रिया, नित्य वेद को सांगोपांग पढ़ना, पुरुषार्थ करना, भूमि (दृढ़ आधारतल) पर शयन, रात्रि के चौथे प्रहर (ब्राह्म-मूहुर्त) जागरण, शौच, दन्तधावन, योगाभ्यास, ऊर्ध्वरेता बनना, युक्ताहार-विहारसेवी, विद्याग्राहिता, सुशीलता, अल्पभाषी, सभा के आचरण, अग्निहोत्र, अभिवादन, दस इन्द्रियों एवं ग्यारहवें मन को संयम में रखना, यम-सेवन पूर्वक नियमों का आचरण, सामाजिक-नैतिक-व्यक्तिगत नियमों का पालन, चतुर्वेदी बनना, न्याय-धर्माचरण सहित कर्म, श्रेष्ठाचार, श्रेष्ठ दान एवं सत्यधारण, न्यायाचरण।

इन निर्देशों के पश्चात् विद्यार्थी को चौदह विद्याओं जो कि बीज रूप हैं का क्रमबद्ध उत्तरोत्तर अभ्यास एक ही आचार्य द्वारा अपने आश्रम में रखकर करवाना चाहिए। इन विद्याओं के ग्रन्थ हैं-

(1) 6 अंग :- 1) शिक्षा, 2) कल्प, 3) व्याकरण, 4) निरुक्त, 5) छन्द, 6) ज्योतिष। आधार पुस्तकें- पाणिनि मुनिकृत अष्टाध्यायी तथा लिंगानुशासन, पतंजलि मुनिकृत महाभाष्य, यास्क मुनिकृत निघण्टु एवं निरुक्त, कात्यायन आदि मुनिकृत कोश, आप्त मुनिकृत त्रि-शब्दार्थ विधि, पिंगलाचार्यकृत छन्द ग्रन्थ, यास्कमुनिकृत काव्यालंकार सूत्र- वात्स्यायन मुनिकृत भाष्य, आकांक्षा, योग्यता, आसत्ति, तात्पर्य और अन्वयार्थ सहित अंक गणित, वैदिक विदुरनीति तथा मनुस्मृति एवं वाल्मिकी रामायण।

(2) 6 उपांग :- आधार पुस्तकें- अ) जैमिनीकृत मीमांसा, ब) कणादकृत वैशेषिक, स) गौतमकृत न्याय, द) व्यासकृत वेदान्त, ई) पतंजलिकृत योग, फ) कपिलकृत सांख्य तथा इनसे अन्तर्सम्बन्धित दस उपनिषदें- ईश, कठ, केन, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक।

(3) चार वेद :- आधार संहिता पुस्तकें- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद। पठनविधि- इन संहिताओं में स्थित मन्त्रों को छन्द, स्वर, पदार्थ, अन्वय, भावार्थ क्रम से पढ़ना। इन वेदों के पढ़ने में सहायक ग्रन्थ हैं- आश्वलायनकृत श्रौत गृह्य तथा धर्म सूत्र। इन की शाखाएं हैं- ऐतरेय, शतपथ, ताण्ड्य, तथा गोपथ ब्राह्मण।

(4) चार उपवेद :- आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद, अर्थवेद। आयुर्वेद में चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, भावप्रकाश निघण्टु, धनुर्वेद में अंगिराकृत लक्ष्यविद्या, गन्धर्ववेद में नारद संहितादि में स्वर, रागिणी, समय, वादित्र, ताल, मूर्छनादि का विवरण तथा अर्थवेद में विश्वकर्मा, त्वष्टा तथा मयकृत शिल्प के संहिता ग्रन्थों का समावेश है। इस के साथ भरतमुनिकृत नाट्य शास्त्र मिलाकर सम्पूर्ण सांगोपांग वेदाध्यायन प्रक्रिया है। इस अध्ययन में वेद अतिरिक्त अन्य ग्रन्थों में कुछ अंश अवैदिक मिलावट आ गई है। अतः ऐसे स्थलों पर वेदानुकूलता से प्रमाण मानना चाहिए। वर्तमान में उपलब्ध वेद भाष्य पढ़ते समय भी शब्दार्थ सम्बन्ध में इस तथ्य का ध्यान रखना चाहिए।

उपरोक्त ज्ञान बीज ज्ञान है। वर्तमान में इन बीजों का पर्याप्त विकास, उपयोग, विधान तथा विज्ञान विकसित किया जा चुका है। समझदार बहुज्ञ आचार्य को इस विकास का जानकार होना चाहिए तथा पाठन में इन बीज ज्ञानों को पढ़ाते समय सन्दर्भित नव विकास से भी विद्यार्थियों को अवगत कराना चाहिए। उपरोक्त सम्पूर्ण संस्कृत ग्रन्थों की रचना में अपवाद स्वरूप कुछ मिलावट छोड़कर “वैदिक वैज्ञानिक विधि” का प्रयोग हुआ है अतः समग्र ज्ञानभण्डार वैज्ञानिक तो है ही साथ ही साथ नैतिक सत्य से आपूर्त भी है।

यह वह शिक्षा पद्धति है जो सांतसा है। इस में जीवन को सांस्कृतिक तकनीकी सामाजिक बीज ज्ञान दिया जाता है। चार मूल वेद संहिताओं के माध्यम से ‘वेद-ज्ञान’ तथा चारों उपवेदों के माध्यम से ‘विद-ज्ञान’ प्राप्त कराया जाता है। इसमें बचपन से युवावस्था तक एक ही ज्ञानधारा जो निश्चित लक्ष्य, निश्चित व्यवहार है का प्रवहण मानव में होता है। यह सर्वांगणीय शिक्षा योजना है जो पुरोहितम् शिक्षा योजना कहलाती है। इसकी निम्न विशेषताएं हैं- 1) पुरोहितम् आधारित, 2) पीरिएड-पीरिएड न बदलनेवाली, 3) वर्ष-वर्ष न बदलनेवाली, 4) धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष समन्वित, 5) शाश्वत प्राकृतिक मूल्यों पर आधारित, 6) शाश्वत नैतिक मूल्यों पर आधारित, 7) वर्तमान विज्ञान समन्वित तथा 8) वैदिक वैज्ञानिक विधि अर्थात् अ) आप्त-ज्ञान, ब) ब्रह्मगुण अनुकूल, स) आत्मवत व्यवहार अनुकूल, द) प्राकृतिक नियम अनुकूल, ई) पंचावयव (वैज्ञानिक विधि) अनुकूल- 1. प्रतिज्ञा (प्राकल्पना-हायपोथीसिस), 2. हेतु (अवलोकन), 3. उदाहरण (तथ्य संकलन-सारिणीकरण), 4. उपनय (सत्य-निकटता), 5. निगमन (निष्कर्ष)- पंच विधि आधारित। यह पंच विधि या अवयव पद्धति आधुनिक वैज्ञानिक विधि है, जो आधुनिक विज्ञान की आत्मा है। वैदिक वैज्ञानिक विधि सांतसा की आत्मा है।

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