विवेकख्याति प्राप्त योगी की सात प्रकार की प्रज्ञा

विवेकख्याति प्राप्त योगी की सात प्रकार की प्रज्ञा

  1. परिज्ञातं हेयं नास्य पुनः परिज्ञेयमस्ति। जो छोड़ने योग्य है मैंने उसे पूर्णरूपेण जान लिया है। उसका जानने योग्य कोई भाग शेष नहीं रहा। यह विवेकख्याति प्राप्त योगी की प्रथम अनुभूति है। संसार में स्थूल रूप में दुःख को सभी जानते हैं। जब शरीर के किसी भी अंग पर आघात होता है, तब प्रत्यक्ष रूप से दुःख का अनुभव होता है। परन्तु प्रत्येक सांसारिक सुख में परिणाम, ताप, संस्कार एवं गुणवृत्तिविरोध इन चार प्रकार का दुःख मिश्रित रहता है। इनको पूर्णरूपेण योगी ही जान सकता है, अन्य नहीं।
  2. क्षीणा हेयहेतवो न पुनरेतेषां क्षेतव्यमस्ति। जो दुःख के उत्पादक कारण हैं उनको मैंने पूर्ण रूप से क्षीण कर दिया है, अब उनका कोई भाग क्षीण करने योग्य शेष नहीं रहा। यह उस योगी की दूसरी अनुभूति है। दुःख का कारण क्या है यह जानना आवश्यक है। इसके बिना दुःख से मुक्ति नहीं हो सकती। क्योंकि “कारणभावात् कार्याभावः” (वैशेषिक दर्शन 4/1/3) कारण के होने से ही कार्य होता है।
  3. साक्षात्कृतं निरोधसमाधिना हानम्। असम्प्रज्ञात समाधि के द्वारा जीवनकाल में ही मोक्ष का साक्षात्कार कर लिया है। यह उसकी तीसरी अनुभूति है। ईश्वर प्राप्ति के पश्चात् और कोई प्राप्तव्य पदार्थ शेष नहीं रहता।
  4. भावितो विवेकख्यातिरूपो हानोपाय इति। एषा चतुष्टयी कार्यविमुक्तिः प्रज्ञायाः। चित्तविमुक्तिस्तु त्रयी। मोक्षप्राप्ति के जो साधन हैं उनको मैंने सिद्ध कर लिया है। अब कोई साधन सिद्ध करने योग्य शेष नहीं है। यह योगी की चौथी अनुभूति है। इस प्रकार उपरोक्त प्रज्ञा की चार प्रकार की कार्यविमुक्ति है, चित्तविमुक्ति तीन प्रकार की आगे वर्णित है।
  5. चरिताधिकारा बुद्धिः। बुद्धि के भोग और अपवर्गरूपी दोनों प्रयोजन पूर्ण हो गए हैं। यह उसकी पांचवी अनुभूति है। भोगापवर्गरूपी प्रयोजनों की सिद्धि के लिए ही ईश्वर ने प्रकृति से बुद्धि का निर्माण किया है। इनके सिद्ध होने पर बुद्धि समाप्त हो जाती है।
  6. गुणा गिरिशिखर तटच्युता इव ग्रावाणो निरवस्थानाः स्वकारणे प्रलयाभिमुखाः सह तेनास्तं गच्छन्ति। न चैषां प्रविलीनानां पुनरस्त्युत्पादः, प्रयोजनाभावादिति। सत्वादि तीन गुण प्रलयाभिमुख हो गए हैं। जैसे पर्वत के शिखर से गिरे पत्थर भूमितल पर आ गिरते हैं, मध्य में नहीं ठहरते हैं। वैसे ही ये गुण = (स्थूल-सूक्ष्म शरीरादि) भी अपने कारण प्रकृति में चित्त के साथ लीन हो जाते हैं अर्थात् अब वे जीवात्मा कार अगला जन्म नहीं करा सकते। यह योगी की छठी अनुभूति है।
  7. एतस्यामवस्थायां गुणसम्बन्धातीतः स्वरूपमात्रज्योतिरमलः केवली पुरुष इति। इस अवस्था में जीवात्मा सत्वादि तीन गुणों से अतीत हो जाता है। अर्थात् प्रकृति और उससे उत्पन्न बुद्धि आदि पदार्थों से स्वयं को पृथक् जानता है और अविद्या, राग द्वेषादि मलों से रहित होकर अपने स्वरूप में और ईश्वर के स्वरूप में स्थित हो जाता है। यह योगी की सातवी अनुभूती है। यह ईश्वरसाक्षात्कार की अवस्था है। इसी का नाम मुक्ति है। इस सात प्रकार की उत्कृष्ट बुद्धि को प्राप्त योगी जीवनकाल में ही कुशल अर्थात् मुक्त कहा जाता है। जब बुद्धि, मन, शरीर आदि प्रलय को प्राप्त हो जाते हैं, तब भी दसको कुशल अथवा मुक्त ही कहते हैं। जीवित शरीर में रहते हुए जब आत्मा मोक्ष का अधिकारी बन जाता है तब जीवनमुक्त कहाता है।

साभार योगदर्शनम्- स्वामी सत्यपति परिव्राजक

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