यम-नियम

यम

अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः। (यो.द. 2/3)
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह ये पांच यम हैं जो “सार्वभौमा महाव्रतम्” कहलाते हैं।

  1. अहिंसा :- शरीर वाणी तथा मन से सब काल में, समस्त प्रणियों के साथ वैरभाव (= द्वेषभाव) छोड़कर प्रेमपूर्वक व्यवहार करना। अहिंसा से अगले सत्यादि चार यम और सभी नियम अहिंसा पर आश्रित और इसकी सिद्धि के लिए हैं।
  2. सत्य :- जैसा देखा, सुना, पढ़ा, अनुमान किया हुआ ज्ञान मन में है, वैसा ही वाणी से बोलना और शरीर से आचरण करना सत्य है। आवश्यकता होने पर सत्य न बोलना (चुप रहना) भी असत्य है। सत्य सब प्राणियों के हित के लिए हो।
  3. अस्तेय :- किसी वस्तु के स्वामी के आज्ञा के बिना उस वस्तु को न तो शरीर से लेना, न लेने के लिए किसी को वाणी से कहना और न हि मन से लेने की इच्छा करना अस्तेय अर्थात् चोरी है। तन, मन, धन से किसी सुपात्र को सहयोग न करना भी चोरी है।
  4. ब्रह्मचर्य :- मन तथा इन्द्रियों पर संयम करके वीर्य आदि शारीरिक शक्तियों की रक्षा करना, वेदादि सत्य शास्त्रों कों पढ़ना तथा ईश्वर की उपासना करना।
  5. अपरिग्रह :- हानिकारक एवं अनावश्यक वस्तुओं का तथा हानिकारक एवं अनावश्यक विचारों का संग्रह न करना।

नियम

शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः। (यो.द. 2/32)

शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान ये नियम हैं। यमों के अनुष्ठान के साथ नियमों का पालन योगाभ्यासी को अपने लक्ष्य की ओर बढ़ाता है, किन्तु यमों के बिना नियमों का पालन करना बाह्य दिखावा मात्र होने से पतन का कारण भी हो सकता है।

  1. शौच :- अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति। विद्या तपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति। जल से शरीर की, सत्य से मन की, विद्या और तप से जीवात्मा की और ज्ञान से बुद्धि की शुद्धि होती है।

बाह्य शुद्धि :- शरीर, वस्त्र, निवास स्थान और आहार को पवित्र रखना, बुद्धिनाशक नशीले मद्य-मांसादि का त्याग करना।

आन्तरिक शुद्धि :- चित्तस्थ मलों को दूर करना अर्थात् ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, मोह, क्रोध, रागादि मलों का त्याग कर देना।

  1. सन्तोष :- यथाशक्ति ज्ञान व योग्यता अनुसार उत्तम कर्मों को करना, उससे प्राप्त फल से अधिक की इच्छा न करना। इससे लोभादि की वृत्तियाँ दुःख नहीं देतीं। सन्तोष पालन से प्राप्त सुख सर्वश्रेष्ठ होता है।
  2. तप :- उत्तम कर्मों के करने में हानि, अपमान, कष्ट, बाधा आदि आने पर भी उस कर्म को न छोड़ना। गर्मी-सर्दी, सुख-दुःख, भूख-प्यास, मान-अपमान आदि द्वन्द्वों को सहना।
  3. स्वाध्याय :- मोक्ष प्राप्ति का उपदेश करनेवाले वाले वेदादि सत्य शास्त्रों का अध्ययन और ओंकारादि पवित्र मन्त्रों का जप करना।
  4. ईश्वर प्रणिधान :- समस्त साधनों- शरीर, धन, मकान, भूमि, सम्पदा, शक्ति, बुद्धि सामर्थ्य आदि ईश्वर का मानकर उसकी आज्ञानुसार कर्म करना तथा उसके फल की इच्छा छोड़ देना। जीवनमुक्त योगी पुरुष चाहे शय्या पर स्थित हो, चाहे मार्ग में जा रहा हो, वह ईश्वर प्रणिधान द्वारा स्वस्थ स्वरूप में ही स्थित होता है। उसके समस्त वितर्कजाल = संशय, अज्ञान, हिंसा आदि नष्ट हो गए होते हैं। वह योगी संसार के बीज (अविद्यादि क्लेशो) तथा उनके संस्कारों का नाश करता हुआ मोक्ष के आनन्द का अधिकारी बन जाता है।

साभार ब्रह्मविज्ञान

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