59. दिया दूध में जहर मिलाए

59 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- वाह रे समाज द्रोहि ब्रहमहत्यारे जगन्नाथ! तूने जहर देकर इस मानव जाति को अनाथ बना दिया।

राग लांगुरिया :-

दिया दूध में जहर मिलाए,

ऋषि का काम अधूरो रहि गयो।।

जगन्नाथ रसोइया तूने बुरा किया।

विष देकर के महापाप किया।।

दीनी ज्ञान की ज्योति बुझाए। ऋषि काम..

एक वेश्या ने नागिन बनकर।

विष वार किया स्वामी पर।।

गई धर्म बेल मुरझाए। ऋषि काम..

इस देश को स्वर्ग बनाने का।

संकल्प लिया गुरु अपने का।।

दिया तन-मन धन विसराए। ऋषि काम..

यहां कर्म-भोग-फल चक्र चलें।

उसमें मानव का वश न चले।।

प्रभु इच्छा पूर्ण होए। ऋषि काम..

वार्ता :- धन्य है ऋषि दयानन्द तुमने अपने प्राण लेने वाले महापातक जगन्नाथ के साथ कैसी दया दिखाई कि उसे नेपाल राज्य की सीमा में भेज दिया। जहां वह पंद्रह वर्ष तक भेष बदल कर रहा। अब देखिये ऋषि दयानंद के शरीर की कैसी दशा है।

बारहमासी :-

जहर का असर अति कष्टकारी पीड़ा।

कीने बहुत उपाय पेट में, पीडा अति भारी।

वैद्य सूरजमल बुलवाए,

देख ऋषि की दशा वैद्यजी मन में घबराए।

दवा कुछ काम नहीं आई है।

आर्य जाति के लिए घटा कलि घिर आई है।

संदेशा राजन मिलवाया,

करने को उपचार अली मर्दानखान आया।

प्रभु ने कैसा न्याय किया,

काया जर-जर भई दावा का उल्टा असर हुआ

खबर चहूं ओर फ़ैल गई है,

ऋषि भक्तों के लिए गजब की चिंता बढ़ गई है।

पालकी राजा भिजवाई,

माउन्ट आबू जाने की ऋषि इच्छा बतलाई।

लक्ष्मणदास दवा दीन्ही,

थोड़े समय के लिए ऋषि को राहत दे दीन्ही।

ऋषि अजमेर आ गए हैं ।

देश के कोने-कोने से ऋषि भक्त पहुंच गए हैं।