58. महाराज निमंत्रण दिया

58 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- महाराजा यशवंत सिंह जी तीन बार स्वामी जी से मिलने आए और तीनों बार राज प्रसाद में पधारने का निमंत्रण दिया।

तर्ज राधेश्याम :-

महाराज निमंत्रण दिया ऋषि को, राज प्रसाद में आने का।

एक रोज पहुंच गए स्वामी जी, देखा था दृष्य लजाने का।।

नन्ही जान एक वेश्या थी, राजा के मन में बसी हुई।

देख ऋषि को बैठ पालकी में महलों से विदा हुई।।

वार्ता :- उस स्थान पर महाराजा यशवंत सिंह को उपस्थित देखकर स्वामी जी धर्मावेश में आकर कहने लगे- ‘‘केसरी की कन्दरा में ऐसी कलुषित कुक्करी के आगमन का क्या काम है?’’

वीर छन्द :-

धर्मावेश में स्वामी जी ने राजा को दीन्हा उपदेश।

सिंह समान वीर क्षत्री को, कुक्करी संग न शोभा देए।

कान भनक वेश्या के पड़ गई, गुस्सा गई वदन में छाए।

इस साधू के प्राण हरुंगी, मन में निश्चय ली ठहराए।

घर के दीपक से घर जलता, दावानल से वन जल जाए।

अपने ही दगा करें अपनों से, लालच ऐसी बुरी बलाए।

जगन्नाथ रसोइया स्वामी का, वो लालच में लिया फसाए।

कालकूट विष उसको दीन्हा स्वामी जी देए खिलाए।।

अश्विनी वदी तिथि चौदस थी, संवत उन्नीस सौ चालीस।

जगन्नाथ ने जहर दे दिया लीला खूब रची जगदीश।।