57. मारवाड़ की मरुभूमि में

57 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- दोनों राव राजा अति सम्मान, सत्कार के साथ स्वामी जी को लेकर आए और मियां फैजुल्ला खां के उ।ान में उनका निवास स्थान तय किया। महाराजा प्रतापसिंह उद्यान के द्वार पर तैनात थे। महाराज तेजसिंह जी स्वयं स्वामी जी की सेवा सुश्रूषा में तैनात थे। राठौर राज्य के राजपूत सरदार स्वामी जी की विमल कीर्ति से प्रभावित होकर उनके शिष्य बनने लगे। सत्रहवें दिन महाराजा जसवंत सिंह जी बड़े ही समारोह के साथ श्री दर्शनों के लिए उपस्थित हुए।

वीर छन्द :-

मारवाड़ की मरुभूमि में, गूंजे, वेदों की आवाज।

न्याय धर्म की चर्चा कर रहे; राजा, राव और महाराज।।

सत्रहवें दिन श्री यशवंत सिंह जी, श्री दर्शन को पहुंचे जाए।

मन उत्साह हृदय में श्रद्धा, बैठे बीच फ़र्स पर जाए।

वैसे ही नजर पड़ी ऋषिवर की, वहां क्यों बैठे हो महाराज।

शोभा नही आपको देता, राज्य जोधपुर के सरताज।।

हाथ जोड़ यशवंत सिंह बोले, ऋषिवर सुनइए विनय हमार।

आश्रम, धर्म और मर्यादा के, हम क्षत्री पालन हार।।

ईश्वर, जीव और मुक्ति पर, स्वामी जी के सुन व्याख्यान।

धन्य धन्य नर कहें नगर के, स्वामी जी एक संत महान।

वैष्णव मत का प्रबल युक्तियों से, खंडन करते महाराज।

तिलक-छाप कंठी माला को, मिथ्या जन्म कहें ऋषिराज।।

समालोचना सुन कुरान की, फैजुल्ला खां मन खिसआए।

कैसे बदला लूं साधू से मन में सोचन लगा उपाए।।

राव ज्वान सिंह कहें ऋषि से, करिए योग्य शिष्य तैयार।

जीवन भर कोई शिष्य मिला नहीं मेरे शिष्य आर्य नर नारि।।