56. फाल्गुन वदी सप्तमी

56 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- जिस सिसौदिया वंश की विमल कीर्ति को महाराणा प्रताप ने उदयास्त तक विस्तृत करके अमर बना दिया, जिस वंश ने ‘‘जो राखे निज धर्म को तेहि राखे करतार’’ इस पाठ को पढ़ा हो, जिस वंश के वीरों ने अपनी आन-बान की रक्षा के निमित मर मिटना तो सीखा हो, परंतु कायर बनकर अपनी शान को वहां नहीं लगाया और जिस वंश की

बहु बेटियों ने प्रचंड चिता पर चढ़कर; जलकर मर जाना तो उत्तम समझा परंतु अपने पवित्र चरित्र पर मलिन दुष्ट लोगों का हाथ स्पर्श नहीं होने दिया, उस वंश के शिरोमणि श्रीमन महाराणा सज्जनसिंह को अपना शिष्य बनाकर जगद्गुरु दयानंद सरस्वती धर्म प्रचार के लिए आगे बढ़ते हैं । श्रावण वदी संवत १९३६ में स्वामी जी जोधपुराधीश महाराजा जसवंतसिंह

के निमंत्रण पर वहां जाने के लिए प्रस्थान करते हैं।

दोहा :-

फाल्गुन वदी सप्तमी के तिथि को व्याकुल हुआ समाज।

छोड़ उदयपुर चल दिए, दयानंद महाराज।।

चौ.-दयानंद महाराज बुलावा जसवंत सिंह का आया।

राठौर वंश की मरू-भूमि में, ऋषि ने कदम बढाया।।

होन-हार बलवान समय को नहीं बांध कोई पाया।

दयानंद के जीवन का अब वक्त आखरी आया।

ऋषि शाहपुर में आए। राव राजा हरषाए।

वहां विश्राम किया है।

वैदिक धर्म प्रचार ऋषि ने झंडा गाड़ दिया है।

वार्ता :- जोधपुर जाते समय आर्य लोगों ने स्वामी से कहा, ‘‘आप जहां जा रहे है वहां के लोग कठोर प्रकृति के हैं । कहीं ऐसा न हो कि सत्योपदेश से चिढ़कर श्री चरणों को पीड़ा पहुंचाए।’’ स्वामी जी महाराज ने उत्तर दिया ‘‘अगर लोग मेरी ऊंगलियों की बत्ती बनाकर जला दें तो भी मैं सत्य बोलने से पीछे नहीं हटूंगा।’’ स्वामी शाहपुर से अजमेर होकर पाली पहुंचे। वहां जोधपुर नरेश की ओर से चारण नवलदान एक हाथी तीन ऊंट, तीन रथ, एक सेज गाड़ी ओर चार वाहन से उतरकर पैदल चलकर आते हैं। जोधपुर नरेश ने कैसा उत्तम

स्वागत किया है। जिसका कहना ही क्या? शहर प्रवेश से पूर्व स्वामी जी की छवि का वर्णन बड़ा ही मनोहारी है।

लामिनी :-

जोधपुर नरेश आन-बान से सत्कार कियौ।

राव राजा ज्वानसिंह और तेजसिंह को भेज दियो।।

दोनों एक रत्नगढ़ को पैदल ही पधार रहे।

स्वामी जी के रूप को वे दूर से निहार रहे।।

काषायाम्बर धारी ऋषि चाल तो गंभीर चले।

मस्तक विशाल उनका चन्द्रमा समान खिलें।।

हाथ में है दण्ड उनके चहरे पर मुस्कान लिए।

कुंदन के समान रूप नर नारी मोह लिए।।

संन्यासी के पास आकर दोनों नम्री भूत हुए।

श्रद्धा के भाव हृदय मंदिर में अभिभूत हुए।।