54. साहस बटोर राणा

54 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- एकांत पाकर एक दिन महाराणा सज्जनसिंह जी स्वामी दयानंद से विनय पूर्वक बोले- ‘‘महाराज अगर आप मूर्ति पूजा का खंडन छोद दें तो एकलिंग महादेव की गद्दी आपकी सेवा में समर्पित है। जिसकी लाखों की आय है। सारा ऐश्वर्य आपका होगा । आप राज-गुरु होंगे।’’ स्वामी जी झुंझलाकर बोले कि ‘‘राणा जी आप तुच्छ प्रलोभन देकर मुझे परमात्मदेव से विमुख करना चाहते हैं, उसकी आज्ञा भंग कराना चाहते हैं। आपके राज्य और मंदिर की सीमा से एक दौड़ लगाकर बाहर जा सकता हूं। पर उस अनंत ईश्वर की आज्ञा भंग करके मैं कहाँ जाऊंगा ? ईश्वर के परमप्रेम के सामने उस मरुभूमि की मायाविनी मरीचिका अतितुच्छ है। ऐसे शब्द कहने का कभी साहस मत करना।’’

लामिनी :-

साहस बटोर राणा स्वामी जी से बोल रहे।

मूर्ति का खंडन छोड़ो मन को वे टटोल रहे।।

एकलिंग मंदिर की गद्दी को तुम स्वीकार करो।

लाखों की आय को जी भर के अंगीकार करो।।

प्रभु ध्यान करके ऋषि; राणा को जवाब दियो।

मेरी ध्रुव धारणा पर आपने सवाल कियो।।

एक बार दौड़ राज्य सीमा को मैं पार करूं।

ईश्वर के राज्य का मैं कैसे बहिष्कार करूं।

तर्ज बारहमासी :-

नहीं कोई वस्तु है जग में।

मेरे प्रबल विचारों को जो कर सकती वश में।

क्षमा राणा ने मांगी है।

आपकी दृढ़ता देखन को अभिलाषा जागी है।

ऋषि ने धर्म कार्य किया।

परोपकारिणी सभा बनाकर वृक्ष खड़ा किया।

सभापति राणा चुन लीन्हे।

तेइस सदस्य की सभा ऋषि ने नियम बना दीन्हें।