50. लखनऊ से कर कूंच

50 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- एक दिन स्वामी जी मोरछल से शरीर पर लगने वाली मक्खियों को उड़ा रहे थे। पास बैठे महाशय अनंतलाल ने कहा कि आप मक्खियों को पीड़ा पंहुचा रहे हैं क्या इसमें दोष नहीं है ? इस पर महाराज ने कहा ‘‘हानिकारक और शुद्र जीवों के निवारण करने में आप जैसे बोदे लोगों ने बाधा डाली है दूसरी नाम मात्र की दया से भारत वर्ष का सर्वनाश हुआ है। आप जैसे मक्खी मच्छर की दया मानने वाले भी, हृदय के दुर्बल मनुष्य, काम पड़ने पर रणक्षेत्र में क्या कर सकता है?’’ स्वामी जी वहां से लखनऊ मैनपुरी की ओर प्रस्थान करते हैं।

बारहमासी :-

लखनऊ से कर कूंच ऋषि अब मैनपुरी आए।

वहां के पोप पुजारी अपने मन में घबराए।

ऋषि के अंतर मन इच्छा,

मातृ शक्ति को सत्य धर्म की तुरंत मिले शिक्षा।

ऋषि मेरठ में आए हैं,

भांति-भांति के लोगों को उपदेश सुनाए हैं।

ज्ञान का फल है सुखदाई,

रमा नाम की विदुषी स्वामी के ढिंग आई।

रमा जी है नारी धन्या,

महाराष्ट्र की रहने वाली ब्रह्मण कुल कन्या।

संस्कृत भाषा की ज्ञाता,

दे-देकर उपदेश बन गई पूरी व्याख्याता।

उसे सत कर्म व्रत दीन्हा।

ब्रह्मचारिणी रहने का ऋषि परामर्श दीन्हा।

आगरा शहर ऋषि आए,

पंडित ज्वालादत्त अनेकों दर्शन को धाए।

शहर की जनता उमड़ रही,

धर्म शास्त्र में निपुण ऋषि की तूती बोल रही।