49. फर्रुखाबाद कानपुर होकर

49 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- प्रसंगवश फर्रुखाबाद में स्वामी जी श्री मदनमोहन लालजी से कहां हमारा उद्देश्य मूर्तियों का तोडना नहीं अपितु मूर्ति पूजा को लोगों के हृदय मंदिर से निकलना है जड़ पूजा के स्थान पर एकमेव परमेश्वर की प्रतिष्ठा स्थापित करना है। देखो ! मुस्लिम आतताइयों ने बाहर से आकर देश के अनेकों मंदिरों की मूर्तियों का विध्वंस किया परंतु मूर्तिपूजा लोगों के हृदय से नहीं निकल सकी।

वीर छन्द :-

फर्रुखाबाद कानपुर होकर, मिरजापुर कीन्हा प्रस्थान।

आश्विन सुदी पूर्णिमा के दिन, दानापुर पंहुचे श्रीमान।।

जन समुदाय उमड़कर आया, स्वागत समारोह सत्कार।

माधौरामजी की कोठी में, ऋषि का जाए लगा दरबार।।

अखिल विश्व का पालन करता, सबका एक वही करतार।

कण-कण में व्यापक वह ईश्वर, फिर कैसे होगा साकार।।

सूरज चाँद सितारे सबके, पृथ्वी वायु और आकाश।

धर्मतत्व भी एक सभी का, हरदम हो मन में आभास।।

विघ्न डालता व्याख्यानों में, चतुर्भुज पंडित दिया भगाए।

दुर्गा अंवस्थी ऋषि चरणों की, रजकण माथे रहा लगाएं।

एक महाशय कहने लागे, स्वामी है ऋषि महान।

गौतम और कणाद के युग में, जो मेरी होती पहचान।।

संशय मेरे मन के अन्दर, गिनती में होता विद्वान।

दानापुर से स्वामी जी ने, काशीधाम किया प्रस्थान।।

धर्म प्रचार किया काशी में, शंका समाधान के साथ।

वैदिक मुद्रणालय बनवाकर, लखनऊ पहुंच गए महाराज।।