48. वेद की बांसुरिया

48 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- बरेली में खचाखच भरे सभा स्थल पर स्वामी जी ने गुजरते हुए कहा लोग कहते हैं महाराज इतना कठोर खंडन मत करिए। आपके शरीर को दुष्टजन हानि पहुंचा सकते हैं। इस देह रक्षा के लिए हम सनातन धर्म को नहीं त्यागेंगे। सत्य को नहीं छोड़ेंगे। वह शूरवीर पुरुष मुझे दिखाइए जो मेरी अंतरात्मा के छिन्न-भिन्न करने का घमंड रखता हो। जब तक ऐसा पुरुष नहीं मिलता दयानंद का सत्य में संदेह करना स्वप्न में भी असंभव है।

राग मल्हार :-

वेद की बांसुरिया, स्वामी जी की बज रही है।। टेक।।

तन मंदिर में प्रभु वास करे,

और सत्य बसे मन के माहीं।

उपकार भरा जीवन उनका,

करुणा बरसे दिल के माहीं।

ज्ञान की बांसुरिया, स्वामी जी….वेद..

कितने लोगों ने कष्ट दिया,

कितने लोगों ने प्यार दिया।

मथुरा काशी में धूम मची,

हरिद्वार में झंडा गड दिया।

तर्क की बांसुरिया, स्वामी जी….वेद..

अधर्म को धर्म जो मान रहे,

उन्हें धर्म की राह दिखा दीन्ही।

पाखंड मतों का खंडन कर,

सत ज्ञान की गंग बहा दीन्ही।

प्रेम की बसुरिया स्वामी जी….वेद..

मंदिर मस्जिद गिरिजाघर में,

हुंकार उठी स्वामी जी की।

पूर्व-पश्चिम उत्तर-दक्षिण,

चहूं ओर विजय स्वामीजी की

ज्ञान की बांसुरिया स्वामी जी….वेद..