47. दई वेद की ज्योति जगाए

47 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- स्वामी जी ने कहा कि रामलाल मैंने तीव्र वैराग्य वश यौवन काल में अपने माता-पिता आदि परिवार जनों का परित्याग किया और मृत्यु को जीतने के लिए योगाभ्यास कर रहा हूं। माता की ममता और पिता के ऋण से मुक्त नहीं हुआ हूं। यह ऐसे कर्म हैं जो योग्य शिष्य मिलने में बाधक हैं। महाराज का कर्म में अटूट विश्वास था, उत्तर भारत में स्वामी जी के विजय के झंडे गड़ने लगे।

रा.बं.ला.हो. :-

दई वेद की ज्योति जगाए,

ऋषि राम-कृष्ण की भूमि में।। टेक।।

गांव-गांव और नगर नगर में,

चर्चा चल रही डगर डगर में,

दई ज्ञान की गंगा बहाए। ऋषि..

शहर बदायूं पंहुच ऋषि ने, डंका जाए बजाया है।

गंगाराम की फुल बगिया में, आसन जाए लगाया है ।।

पाखंडों का जल काटकर,

दिए संशय सभी मिटाए। ऋषि..

शहर बरेली गए ऋषि जब लक्ष्मीनारायण लिवाए।

अपनी कोठी में ठहराकर हाथ जोड़ रहे विनय सुनाए।

भाषण में नर्मी अति लाकर,

प्रसंग वश सबको समझाकर,

शहर कोतवाली के पद पर मुंशी राम के पिता सुजान।

प्रेरित कीन्हा सुत अपने को दयानंद के सुन व्याख्यान।।

वाणी की देखी चतुराई,

रूप मोहिनी मन को भाई,

गए मुंशीराम चकराए। ऋषि..

चर्चा सुनकर पाए ब्रह्म की मुंशीराम अवाक् हुए।

मन का संशय मिटा नहीं तो स्वामी जी के पास गए।।

दया भाव जब होए प्रभू का,

तब होवे विश्वास उसी का,

मन श्रद्धा से भर जाए। ऋषि..

लक्ष्मण पंडित शाहजहां पुर का, स्वामी जी रहा बतराए ।

शंखासुर वेदों को ले गया क्यों रहे वेद-वेद चिल्लाए।

आलस रूप शंखासुर मारा,

वेदों पर वर्चस्व हमारा,

दिए सबको वेद बताए । ऋषि..