46. कायम मंत्र निवासी

46 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- एक उम्मीद खां और पीर जी इब्राहीम ने स्वामी जी से निवेदन किया कि हमने सुना है कि आप किसी को भी आर्य बना लेते हो। आर्य श्रेष्ठ धर्मात्मा को कहते है अगर आप सन्मार्ग पर चलकर आर्य धर्म का पालन करो तो आप भी आर्य हैं। वे बोले अगर हम आर्य बन गए तो क्या आप हमारे साथ भोजन करेंगे ? स्वामी जी ने कहा कि ‘‘हमारे धर्म में किसी का जूठा खाना वर्जित है, परंतु सहभोज में कोई दोष नहीं।’’ ‘‘स्वामी जी ! झूठा

खाने से परस्पर प्रीति बढती है’’-वे कहने लगे ‘‘अगर ऐसा है तो कुत्ते एक दुसरे का जूठा खाते-खाते आपस में काटने-नौंचने लगते हैं’’ यह सुनकर दोनों आवाक रह गए।

तर्ज बारहमासी :-

कायम मंत्र निवासी एक दिन रामलाल आए।

वर्षा ऋतु में कष्ट झेल श्री दर्शन को धाए।

इन्द्रमन साथ में आए हैं,

श्रद्धा से भरपूर भक्त ने भाव बताये हैं।

दयानंद करुणा के सागर,

रामलाल जी धन्य मान रहे गुरु मंत्र पाकर।

वचन यो रामलाल कहते,

लेते शिष्य बनाए योग्यतम कार्य पूर्ण करते।

महर्षि व्याकुल मन बोले,

है कुछ ऐसे कर्म दूर नहीं होंगे बिन भोगे।

त्याग मैंने घर का सब कीन्हा,

चुका नहीं ऋण मात-पिता को दुःख बहुत दीन्हा।

मात की ममता ठुकराई,

ऐसे हैं ये कर्म शिष्य न योग्य मिला भाई।

भविष्य उज्जवलतम देखेंगे,

आर्य समाज को कई विद्वज्जन सीचेंगे।