45. कुंभ पड़ा हरिद्वार में

45 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- एक दिन स्वामी जी बैठे- बैठे लेट गए और फिर उठकर टहलने लगे। एक भक्त ने पूछा कि महाराज क्या बात है। बड़े बेचैन नजर आ रहे हो। स्वामी जी ने कहा कि मेरी बेचैनी का कारण विधवाओं की दुःख भरी आह, अनाथों का निरंतर आर्त नाद और गौवध से इस देश का सर्वनाश हो रहा है। हृदय में पर पीड़ा के भाव लिए स्वामीजी हरिद्वार के कुंभ मेले में आते हैं।

दोहा :-

कुंभ पड़ा हरिद्वार में, ऋषिवर पहुंचे जाए।

श्रवणनाथ के बाग में, आसन दिया लगाए।।

विज्ञापन चहुं दिशि लगे प्रचार हुआ घनघोर।

जिज्ञासु और संत महात्मा चले ऋषि की ओर।

बहर तबील :-

स्वामी आनंदवन बड़े तैश में,

ऋषि दयानंद से बात करने लगे।

हार उनकी हुई शास्त्र संग्राम में,

पक्ष ऋषिवर का सच्चा बताने लगे । (१)

मठाधीशों के दर्शन से कुछ ना मिला,

गंग स्थान से शुद्ध होता वादन ।

परम तृप्ति मिले अंत मुक्ति मिले,

जिसने आकर सुने थे ऋषि के वचन । (२)

आर्ष भाषा के प्रबल प्रचारक थे वे

राष्ट्र निर्मित उसी के हितैषी बने ।

राष्ट्र गौरव का सम्मान पल पल लिया,

आर्य भाषा में वे ग्रन्थ सारे लिखे । (३)

कर्नल अल्काट मैडम ब्ले वट स्की,

वे सहारनपुर में ऋषि से मिले ।

पहुंच मेरठ में दोनों हुए एक मन,

ऐसा देखा मिलन तो विदेशी जले । (४)

मुरादाबादी कलेक्टर के अनुरोध पर,

राजनीती का व्याख्यान ऋषिवर दिया ।

शासकों शोषितों का सम्बन्ध क्या,

ऐसे उदात्त नियमों का वर्णन किया । (५)