43. विशुद्धानंद जी और बाल शास्त्री

43 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :-‘‘एक भक्त ने पूछा महाराज क्या कारण है ? जहां रास-रंग हास-विलास होता है वहां सारी रात नींद नहीं आती परंतु जहां सत्संग हो, धर्म चर्चा हो थोड़ी देर में लोग ऊंघने लगते है।’’ स्वामी जी ने उत्तर दिया ‘‘हरिकथा तो एक सुकोमल शय्या है उस पर नींद नहीं आएगी तो कहाँ आएगी? कांटो का बिछौना उस पर नींद कैसे आएगी?’’ एक दिन महाराज ने गंभीर होकर पं. भोलाराम जी से कहां..

लामिनी :-

विशुद्धानंद जी और बाल शास्त्री मेरा अंग साथ देते।

मूल काटकर पाखंडों की धर्म को शुद्ध बना देते।।

भारत माता जग-मग होती, वेद की ज्योति जला देते।

ओ३म् पताका कर में लेकर दुनियां में फहरा देते।

वार्ता :- मुझे दुःख इस बात का है कि उन्होंने मुझे गलत समझा, मेरा घोर विरोध किया परंतु मेरे हृदय की निर्मल भावना को ईश्वर जानता है। संवत १९३५ श्रावण मास अमावस्या को स्वामी जी पंजाब से रुड़की पधारे।

लागुरिया :-

रुड़की में कर धर्म प्रचार ऋषि मंडल में आए हैं।। टेक।।

गंग महात्म्य मूर्ति पूजा पर प्रश्न किए लोगों ने।

तिलक श्राद्ध अवतार वाद के तर्क दिए लोगों ने।।

दयानंद के तर्कों से पंडित घबड़ाए हैं। रुड़की..

अंतरूकरण में ईश्वर साक्षी सबके रहता है ।

जब मन पाप कर्म को करता तब वह कहता है ।।

बुरे कार्य के करने वाले सब पछिताए हैं। रुड़की..

एक दिन हरिश्चंद्र चिंतामणि मुंबई से आए हैं ।

साथ में श्यामकृष्ण जी वर्मा मिलने को आए हैं ।।

लेकर के आदेश ऋषि का तुरंत सिधाए हैं। रुड़की..

मेरठ शहर में बिगुल बजाकर दिल्ली में आए हैं ।

सब्जी मंडी में जाकर के डेरा लगवाए हैं ।।

आर्य समाज बनाए ऋषि जयपुर को धाए हैं। रुड़की..

दिल्ली में कर धर्म प्रचार ऋषि जयपुर में आए हैं।।