42. आर्य समाज का बाग

42 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- एक दिन पा. बुकैनयन महाशय स्वामी के पास आकर बोले महाराज- मृत देह को भूमि गाड़ना लिखा है वेद में। और उसने प्रमाण में मोक्षमूलर का भाष्य बताया जिसमें लिखा था कि ‘‘हे भूमि तू अपनी भुजा जिसमें मृतक देह रक्खी जाए।’’ स्वामी जी ने उसी मंत्र से बताया कि यहां यह वर्णन है कि ‘‘भूमि को खोदकर वेदी बनाई जाए उसमें मृत देह

को जलाया जाए’’ स्वामी जी कहा करते थे वैदिक धर्म प्रचार हेतु अपने प्राणों की आहुति देने को तत्पर रहता हूं। आर्य समाज रूपी उद्यान की रक्षा अपनी सफल सामर्थ्य से करुंगा।

वीर छन्द :-

आर्य समाज का बाग लगाया, मैंने इस भूमंडल पर।

वेद ज्ञान का सूर्य प्रकाशित होगा, इस नभ मंडल पर।

मैं हूं माली इस बगिया का, रहता हूं हरदम होशियार।

पानी खुद सुरक्षा से ही, इसकी कायम रहे बहार।

(सवैया)

यह बाग लगाया है ऐसा, छाया में दुःखी संसार रहे।

कल्याण करे सब दुनिया का विद्या का अतुल भंडार रहे।।

यह काल बनेगा पोपों का बरदान बना दलितों का रहे।

सम्मानित हो इससे नारी, उद्धारक भी पतितों का रहें।।