41. प्रान्त पंजाब में ऋषि

41 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- पंजाब में स्वामी जी के प्रचार से आर्य समाज की स्थापना होने लगी। सारे नगरों में धर्म आन्दोलन होने लगा । स्थान-स्थान पर धर्म के नूतन संस्कार की चर्चा होने लगी।

बहर तबील :-

प्रान्त पंजाब में ऋषि दयानंद ने, वेद ज्योति का घर-घर उजाला किया।

धूर्त पापों ने छल बल का ले आसरा, हर तरह से परेशान उनको किया।

पंच नदियों से निर्मित ये पावन धरा, हर तरफ से कहे ऋषि निराला हुआ।

आम जनता में ऐसी मची खलबली, सबको आभास नूतन धर्म का हुआ ।

वार्ता :- एक बार मंदिर का पुजारी रघुनाथ स्वामी जी से शास्त्रार्थ करने आया। स्वामी जी ने कहा कि ‘‘पहले पुजारी शब्द का अर्थ तो बताइए ?’’ वह कुछ उत्तर न दे सका। स्वामी जी ने कहा कि ‘‘पुजारी शब्द का अर्थ है पुजा का शत्रु।’’ आप लोग पंडित होकर ऐसे नाम क्यों रखते हैं। पुजारी शर्म के मारे भाग गया।

तर्ज बारहमासी :-

ऋषि पंजाब विचरते है,

गुजरांवाला में पं. विद्याधर रहते हैं। 

पादरी पंडित ढिंग जावें,

दोनों मिलकर दयानंद के दुश्मन जावें।

उन्हें पंडित ने दी घुड़की,

दयानंद के साथ हमारी चर्चा है घर की।

पादरी विवश लौट गए हैं,

शास्त्र समर स्वामी से सभी हार गए हैं।

लौट लाहौर चले आए,

अल्ला रक्खा की कोठी में आसन लगवाए।

बहुत से मुसलमान आए,

मुस्लिम मत का खंडन सुनकर मन में अकुलाए।

शहर मुलतान पधारे हैं,

नारायण कृष्ण ने स्वामी जी से वचन उचारे हैं।

मांस खाने से क्या हानि,

घोर पाप का कर्म वेद की आज्ञा न मानी।

नहीं आरोगी रह सकता,

मांसाहारी कभी नहीं कोई योगी बन सकता।