40. अमृतसर गुरुदासपुर शहर

40 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- अमृतसर में आर्य समाज की स्थापना कर स्वामी जी गुरुदासपुर बटाले होकर जालंधर शहर में अपने उपदेशों की वर्षा करने लगे।

दोहा :-

अमृतसर गुरुदासपुर शहर बटाले जाए।

जालंधर में आए कर ऋषि शोभा रहे बढ़ाए।।

तर्ज राधेश्याम :-

विक्रमसिंह की कोठी में ऋषि, आसन जाए लगाया है।

मौलवी अहमद हसन ऋषि से, प्रश्न पूछने आया है।।

पुनर्जन्म और चमत्कार पर, पूछे प्रश्न बहुत सारे।

वाद-विवाद में पोल खुली तो, भाग गया भय के मारे।

पैंतीस व्याख्यान हुए शहर में, गूंजे घर-घर में आवाज।

ब्रह्मचर्य का महत्व बता रहे, एक दिन दयानंद महाराज।

शंका उपजी विक्रमसिंह को स्वामी जी से करें विचार।

ऐसा क्या है ब्रह्मचर्य में, मन अपने सोचे सरदार।।

घोड़ा-गाड़ी के वाहन में, घर जाने को भए सवार।

पहिया पकड़ लिया स्वामी ने, बग्घी जरा न बढ़ी अगार।।

मुड़कर देखा विक्रमसिंह ने, गाड़ी कैसे रुक गई है।

ब्रह्मचर्य के महत्त्व को समझे, फिर आगे को बढ़ गई है ।।

सूरत सीरत दोनों अनुपम, प्रभु की महिमा अपरम्पार।

वेद शास्त्र में निपुण दयानंद, शारीरिक बल के भंडार।।

रावलपिंडी गुजरांवाला, सारा जीत लिया पंजाब।

फिरोजपुर की छावनी पहुंचे हिंदूसभा बनी, आर्य समाज।।