39. खंडन सुनकर हिन्दू मत का

39 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- ईसाई स्कूल में पढने वाले चालीस युवक मन से ईसाई बन चुके थे वे ईसाई रीति से प्रार्थना करते थे। परंतु स्वामी जी के उपदेश सुनकर उनके हृदय में ईसाई मत का विचार कपूर की भांति उड़ गया। वे पुनः अपने मत में आ गए।

वीर छन्द :-

खंडन सुनकर हिन्दू मत का, अंग्रेज कमिश्नर मन हरषाए

स्वामी जी के पास में आकर, अपनी शंका रहा बताए।।

मुझको शंका हिन्दू मत पर, यह तो धर्म टिकाऊ नाए।

न अनुशासन न कोई नीति, कोई एक मसीहा नाए।

तुरंत जवाब दिया स्वामी ने, हिन्दू धर्म समुन्द्र समान।

परमेश्वर को मानो न मानो, फिर भी बनी रहे पहचान।।

परोपकारी सद्गुण वाले ब्रह्मचारी और दया निधान।

नीति विशारद शास्त्र प्रणेता, आज्ञाकारी निष्ठावान।।

ज्ञानी-ध्यानी और तपस्वी, योगी-यती श्रेष्ठ परिवार।

ढोंगी कपटी और पाखंडी, कहते ईश्वर ले अवतार।।

अत्याचारी क्रूर कुचाली, सबकी है इसमें भरमार।

खाओ पीओ मौज उड़ाओ, नास्तिक मत के दावेदार।।

छुआ-छुत का भेद बहुत है, ऐसे भी हैं सब का खाए।

त्यागी भोगी और प्रमादी, धर्म का रहे मखौल उड़ाए ।।

धर्मशील दानी और मानी, क्षमाशील प्रभु भक्त महान।

मन मरजी का जीवन जीना, यह है हिन्दू की पहचान।।

ऐसा धर्म टूट नहीं सकता, व्यापक हो जिसका आधार।

छोटी-छोटी भूल सुधर जाए, तब होगा इसका विस्तार।।

संशोधित इसको करने का, मैंने बीड़ा लिया उठाए।

सत्य सनातन वेद ज्ञान को, चारों ओर रहा फैलाए।।