38. श्री चरणों की करें वंदना

38 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- मुंबई आर्य समाज की स्थापना के समय जो अठाईस नियम बने थे उनको संशोधित कर उनकी जगह दस नियम बनाए गए जो वर्तमान समय में हैं  अब इनमे परिवर्तन की कोई गुंजाइश नहीं रही। मुंबई के नियमों में वेद को ईश्वरीय ज्ञान नहीं बतलाया था ईश्वर सृष्टि का रचियता भी नहीं था इसके अलावा श्रेष्ठ सभासदों की राय से नियमों में हेर-फेर भी हो सकता था। पंजाब प्रान्त के मस्तिष्क लाहौर को अपने उपदेशों से प्रभावित कर स्वामी जी अमृतसर के लिए प्रस्थान करते हैं।

चौक :-

श्री चरणों की करें वंदना, धन्य-धन्य नर कहते हैं।

धर्म ध्वजा फहराए ऋषि, लाहौर नगर से चलते हैं।।

अमृतसर में आए देख, उत्साह प्रजा में भारी है।

प्रतिमा पूजन मृतक श्राद्ध, पाखंड का खंडन जारी है।

मिथ्या मूलक मत पंथों की, बाढ़ देश में आई है।

गौरव गरिमा नष्ट हुई, इसलिए गुलामी छाई है।।

पहृप मंडली विचलित हो गई, दयानंद के तीरों से।

सत्य नहीं टल सकता हरगिज, झूठ की कुटिल लकीरों से।।