37. सतलज झेलम व्यास

37 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- सज्जनों इस प्रकार स्वामी जी बिना हिंसा किये अपने प्राणों की रक्षा की। शाक्त लोग स्वामी जी की बलि चढ़ाना चाहते थे। धन्य है ऋषि दयानंद ! तूने अपने प्राण लेने वालों का भी कल्याण चाहा। शाहजहांपुर से सहारनपुर होते हुए ऋषि पंजाब प्रान्त के लुधियाना शहर के लिए कूच करते हैं। वैशाख वदी द्वितीय संवत १९३४ को वे पहली बार पंजाब की पावन धरती पर पैर रखते हैं।

दोहा :-

सतलज झेलम व्यास, नद, रावी और चिनाब।

इन पांचों के मध्य में बसे देश पंजाब।।

चौबोला :-

बसे देश पंजाब दयानंद, लुधियाना को धाए।

सं उन्नीस सौ चौतीस वदी, वैशाख माह में आए।

बंशीधर के सुरम्य बाग में, आसन जाए लगाए।

ढेरों सारे ग्रन्थ बैलगाड़ी पर जा पहुंचाए।

पादरी बेरी आया, कृष्ण पर दोष लगाया।

निवारण उसका कीन्हा।

उसको दे उपदेश, कूंच लाहौर शहर कर दीन्हा।

वीर छंद :-

रतनचंद की फूल-बगिया में, स्वामी डेरा दिया लगाए।

बावली साहब में जाए नित्यप्रति, वेद का अमृत रहे पिलाए।

ब्रह्म समाजी और पादरी, पंडित पौराणिक भय खाए।

रहीम खां की कोठी पर ऋषि, उनकी गलती रहे बताए।

भक्त एक मनफूल महोदय, स्वामी जी का रखते ध्यान।

धन्य-धन्य जिज्ञासु कहते, शंका मिटी सुनत व्याख्यान।।

राव बहादुर मूल राज जी, ऋषि का करत बहुत सम्मान।

आर्य समाज करो स्थापित, चारों ओर यही गुणगान।।

प्रधान चुने थे मूलराज ली, मंत्री लाला साईदास।

संशोधित नियमों को कीन्हा, जिससे पड़ी ठोस बुनियाद।।

संस्थापक की पदवी ऋषि ने, यों कहकर दीन्हीं ठुकराए।

मठ गद्दी की गलत धारणा, लोगों को देगी बहकाए।।

कुछ पंडित यूं कहने लगे, वेद पुराण को लेऊं मिलाए।

मुझे नहीं स्वीकार संगति, अमृत विष में देऊं मिलाए।।