36. जीत भई नर पुंगव की

36 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- चांदापुर मेले के शास्त्रार्थ में श्री प्यारेलाल जी ने सब मतावलंबियों को नियम और विषय के बारे में समझाया। पांच विषय नियत किए गए जो इस प्रकार हैं।

१. सृष्टि को ईश्वर ने किस वस्तु से और कब और क्यों बनाया ?

२. ईश्वर सर्वव्यापक है अथवा नहीं ?

३. ईश्वर न्यायकारी और दयालु किस प्रकार है ?

४. वेद,बाइबिल और कुरान के ईश्वर वाक्य होने में क्या युक्ति है ?

५. मुक्ति क्या वस्तु है और वह किस प्रकार मिल सकती है ?

इस अभूतपूर्व शास्त्रार्थ में स्वामी दयानंद की पताका चहुँ ओर फहराने लगी है, सर्वत्र उनके वेद ज्ञान की चर्चा होने लगी।

सवैया :-

जीत भई नर पुंगव की, जब चारों ओर भयो उजियारो।

वेद के ज्ञान की ज्योति जली तब दूर भयो मन को अंधियारों।

भयभीत भए मत-पंथ सभी, ज्यों शेर की मांद से सियार सिधारो।

सूरज की नव ज्योति जगी, कहां दीपक की लौ का पतियारो।

वार्ता :- स्वामी जी की तर्कपूर्ण खंडन शैली से घबराकर शाक्त संप्रदाय के लोगों ने उनके प्राण हरण की चेष्टा की।

राग लांगुरिया :-

स्वामी दयानंद के प्राण घोर संकट में फँस गए हैं।। टेक।।

मीठे वचन सुनाए ऋषि को ले गए शाक्त लिवाए।

कई दिनों तक सेवा कीन्ही, श्रद्धा बहुत दिखाए।

पर्व पड़ा एक रोज ऋषि को, मंदिर ले गए है। स्वामी..

देवी के मंदिर में उनसे कहने लगा पुजारी।

झुक करके प्रणाम करो, यह जम की पालन हारी।

खड्ग हाथ में देख दुष्ट के नयना खुल गए हैं। स्वामी..

मार झपट्टा छीन खड्ग को, आगे को बढ़ते हैं।

देखा द्वार बंद बाहर का हिंसा से बचते हैं।

उछल कूद दीवार फांदकर, तुरत निकल गए हैं । स्वामी..