35. ऋषि मेरठ से आए हैं

35 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- इस अभूतपूर्व सभा में स्वामी जी ने प्रस्ताव रखा कि भारत के वासी परस्पर एक मत होकर एक नीति से देश का सुधार करें तो आशा है कि देश सुधर जाएगा। परंतु स्वार्थ और अहम् के कारण धर्मध्वजी एक न हो सके। स्वामी दयानंद सत्य के इतने प्रबल पक्षधर थे, वे कहते थे कि मैं अमृत को विष मिश्रित कर देना नहीं चाहता। सच्चाई छिपाना महापाप है अंत में सत्य की ही विजय हुआ करती है। स्वामी जी दिल्ली से मेरठ के लिए कूच करते हैं।

                     (चांदापुर शास्त्रार्थ)

तर्ज बारहमासी :-

ऋषि मेरठ से आए हैं।

कुछ दिन कर सत्संग, सहारनपुर को धाए हैं।

ब्रह्म मेला का दिन आयौ,

शाहजहां के पास चांदपुर में मौसम छायौ।

प्रसिद्ध मेला की भारी,

मुस्लिम पादरी, कबीर पंथ में बहस होत जारी।

खबर चहूं ओर फ़ैल गई है,

कबीर पंथ गया हार, जीत मुल्ला की है गई है।

सभी पंथी सरमाए हैं,

अपनी जीत के लिए इन्द्रमन के घर आए हैं।

बात सुन कही इन्द्रमन जी

धर्म शास्त्र में निपुण देश में ऋषि दयानंद जी ?

ऋषि के तर्क करारे हैं,

शास्त्र समर में सुनों सभी मत वादी हारे हैं।

खबर तुम उन तक पहुँचाओ,

सहारनपुर को जाए ऋषि को सादर बुलवायौ।

देर ना जरा लगाई है।

सहारनपुर में पहुंच ऋषि को विनय सुनाई है।

ऋषि मेला में आए हैं,

प्यारेलाल ने शास्त्र समर के नियम बताए हैं ।