34. अब दिल्ली के दरबार में

34 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- स्वामी दयानंद को पता चला कि रानी विक्टोरिया के स्वागत में देश के राजाओं को दिल्ली में आमंत्रित किया गया है तो वे उपयुक्त अवसर जानकर अलीगढ़ होकर दिल्ली पहुँचते हैं वे समझते थे कि सामान्य जनता की अपेक्षा राज पुरुषों को प्रभावित करने से ज्यादा लाभ होगा। राजा बदलेगा तो जनता के बदलने में समय नहीं लगेगा।

राग ख्याल :-

अब दिल्ली के दरबार में सब रजा लोग बुलाए। टेक-

रानी विक्टोरिया आई है, हमें गुलाम बनाने को।

स्वागत करने राजा जा रहे, लानत राज घराने को।

कायर पूत जनें मत जननी,

बांझ भली संसार में। सब राजा..

ध्यान लगा ऋषि मन में सोचें सुन्दर अवसर आया है।

सेरूमल के अनारबाग में आसन जाए लगाया है।।

सिंहगर्जना दयानन्द की,

गूंजे घर-परिवार में। सब राजा..

राजा जयकृष्ण दास साथ में, ठाकुर मुकन्दसिंह भूपाल।

पंडित भीमसेन इन्द्रमन, ऋषि का हरदम रखते ख्याल।

वेद नीति को राजा समझे,

रहते इसी विचार में । सब राजा..

नहीं सफलता मिली कार्य को, गुत्थी तुरंत लई सुलझाए।

राज्य सभा की जगह ऋषि ने धर्म सभा को लिया बुलाए।।

ईश तत्व और धर्म तत्व का,

निर्णय होए जहान में। सब राजा..

वार्ता :- भारतीय राजाओं द्वारा कार्य की सफ़लता न देख ऋषि दयानंद ने भिन्न-भिन्न मत और जातीय विभागों के नेताओं की एक धर्म सभा बुलाई। जिसमें पंजाब के सुधारक कन्हैयालाल अलख धारी, श्री युत नवीनचंद राय, श्री हरिश्चंद्र चिंतामणी, सर सैय्यद अहमद खां, श्री केशवचंद्र सेन और श्री इन्द्रमन जी प्रमुख थे। सभा में स्वामी क्या कहते हैं ?

लामिनी :-

देश की दयनीयता का लोगों से बखान करें।

मानव का धर्म एक उसकी सब पहचान करें।।

वेद की सुनीतियों का स्वामी जी प्रचार करें।

आओ हम मिलकर इस देश का उद्वार करें।।

आपसी मतभेदों का हम, पहले परित्याग करें।

एक साथ बैठ एक नीति पर विचार करें।।