33. कृष्ण पक्ष आषाढ़ का

33 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

                     (पूना कांड)

वीर छन्द :-

कृष्ण पक्ष आषाढ़ का आया तेरस तिथि दिन मंगलवार।

संवत उन्नीसौ बत्तीस को, पुना पहुंचे गए महाराज

लामिनी :-

वेद की ऋचाएं बोल, पूना को पुनीत किया।

गोविन्द रानडे महादेव ने स्वामी का सत्कार किया।।

पालकी सजाए नगर कीर्तन का प्रबंध किया।

गली-गली हाट-हाट वेद का प्रचार किया।

रसिया :-

मिल गए दुष्ट पुजारी। उनने हुल्लड़ की करी तयारी।

निकाली गदर्भानंद सवारी। ऋषि अपमान के लिए। टेक-

लामिनी :-

दुष्ट नीच पामर जन, कोलाहल अति भारी करें।

कीचड़ ईट पत्थरों की, स्वामी पर बरसात करें।।

रानडे जी यह देख हाल, मन ही मन विचार करें।

मान और अपमान की ना, स्वामी जी परवाह करे।।

रसिया :-

विज्ञापन भए जारी। सभी पापों ने बाजी हारी।

ऋषि के कदम बढ़ गए अगारी, शहर मुंबई के लिए। टेक-

वार्ता :- पूना शहर में स्वामी जी के पंद्रह व्याख्यान बड़े ही प्रभावशाली हुए, जिनके कारण स्थान-स्थान पर स्वामी जी की विद्वत्ता की चर्चा होने लगी। पूना नगरी को वेद की ऋचाओं से पवन कर स्वामी जी मुंबई शहर की ओर चल दिए।

चौपाई :-

पूना से ऋषि मुंबई आए। आर्य सभासद मन हरषाए।

कुछ दिन मुंबई किया प्रवासा। संस्कार विधि किया प्रकाशा।

वेद ज्ञान का दीप जलाकर। उत्तर भारत गया ऋषिवर।

कायम गंज अयोध्या काशी। लखनऊ पहुंच गया संन्यासी।

विक्रमसिंह जी लेकर आए। अपनी कोठी में ठहराए।

राजा जयकृष्ण दास पधारे। दयानंद के चरण पखारे।

इन्द्रमन सत्संग में आते। सुन व्याख्यान धन्य हो जाते।

चर्चा करें नगर के वासी। मिला नहीं ऐसा संन्यासी।