30. बाबा मोहनलाल ब्रह्मचारी

30 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- मुबई से स्वामी सूरत शहर पधारे वहां रेल्वे स्टेशन पर महाराज का स्वागत समारोह हुआ । स्वामी जी रायबहादुर जगजीवनदास खोसलदास के आवास में ठहरे। भक्तों की मण्डली श्री दर्शनों को आने लगी।

बाबा मोहनलाल ब्रह्मचारी, पास ऋषि के आते हैं।

भक्ति भाव से ऋषि चरणों में, श्रद्धा सुमन चढाते हैं।।

व्याख्यान के बाद नगर में, कोलाहल मच जाता है।

पत्थर ईट बरसते उन पर, हुल्लड़ तक हो जाता है।।

शांति स्वभाव धैर्य की मूर्ति, लक्ष न अपना छोड़ा है।

सूरत से चल दिये दयानंद, भरूच से नाता जोड़ा है।।

जेठालाल वकील एक दिन पास ऋषि के आते हैं।

श्रद्धा युक्त प्रेम भक्ति से, मीठे वचन सुनाते हैं।।

वार्ता :- भरुच में स्वामी जी से जेठालाल वकील विनय पूर्वक निवेदन करते हैं।

बहर तबील :-

शास्त्र विधि द्वारा मंडन करो मूर्ति का,

जग में कीर्ति बढ़ेगी ऋषि-आपकी।

लोक मानस में शंकर के अवतार की ,

पूजा घर-घर में होगी ऋषि आपकी।

(स्वामी जी उवाच)

बहर तबील :-

मुझे विश्वनाथ पदवी का लालच दिया,

काशी नगरी में डंका बजा वेद का।

कोई बन्धन नहीं जो हमें बांध ले,

दिल आभास रहता सदा ईश का।

वार्ता :- जाति-पाति, ऊँच-नीच, छोटे-बड़े की भेदभावना से मुक्त ऋषि दयानन्द जी दया के सागर थे।

बहर तबील :-

एक दिन कृष्णराम जी ज्वर से पीड़ित हुए,

उनके सर को दबाने लगे थे ऋषि।

बोले भगवान अरे ! आप करते हो क्या,

पाप मुझको लगेगा क्षमा दो ऋषि।।

     (स्वामी जी)

बोले स्वामी जी इसमें कोई पाप ना

सेवा करना मनुष्य का परम धर्म है।

भाव सेवा का छोटों में उत्पन्न हो,

सीख देना बड़ों का प्रथम कर्म है।