29. स नो बन्धुर्जनिता.. १..!!

स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा। यत्र देवा ऽ अमृतमानशानास्तृतीये धामन्न– ध्यैरयन्त।। 7।। (यजु.अ.32/मं.10)

        हे मनुष्यों वह परमात्मा अपने लोगों का भ्राता के समान सुखदायक, सकल जगत् का उत्पादक, वह सब कामों का पूर्ण करनेहारा, सम्पूर्ण लोकमात्र और नाम-स्थान-जन्मों को जानता है। जिस सांसारिक सुख-दुःख से रहित नित्यानन्दयुक्त मोक्षस्वरूप धारण करनेहारे परमात्मा में मोक्ष को प्राप्त होके विद्वान् लोग स्वेच्छापूर्व्रक विचरते हैं वही परमात्मा अपना गुरु, आचार्य, राजा और न्यायाधीश है। अपने लोग मिलके सदा उसकी भक्ति किया करें।

भ्राता तुल्य सुखद् वह ही प्रभु, सकल जगत् का जीवन प्राण।

मानव के सब यत्न उसी की, करुणा से होते फलवान।।

सदानन्दमय धाम तीसरा, सुख-दुःख के द्वन्द्वों से दूर।

करके प्राप्त उसे ज्ञानी जन, आनन्दित रहते भरपूर।।