28. गंगा तट घाट पर

28 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- प्रयाग में गंगा के तट पर एक वयोवृद्ध महात्मा रहते थे, वे दयानंद महाराज जी को बच्चा कहकर पुकारा करते थे। एक दिन दयानंद से क्या कहते हैं?

कवित्त :-

गंगा तट घाट पर, वयो वृद्ध महात्मा ने,

एक बार स्वामीजी को वचन सुनायौ है।

निवृत्ति मार्ग छोड़कर, लोक कल्याण हित,

ब्रह्म लीन मुक्ति का, अवसर गवायो है।

बोले ऋषि मुक्ति की, इच्छा अब जाती रही,

देख दशा भारती, मन अकुलायो है।

दीन हीन कमजोर, दुरूखी दुःख भोग रहे,

उनके उद्धार में, परम सुख पायौ है।

वार्ता :- श्री महाराज को बम्बई वालों के अनेक पत्र उन्हें बुलाने के मिला करते थे। स्वामी जी ने बम्बई जाने का निश्चय कर लिया और वे नासिक होकर मुंबई आ जाते हैं।

वीर छन्द :-

संवत उन्नीससौ इकतीस को, जब द्वादश अश्विनी मास।

प्रयाग, जबलपुर, नासिक होकर मुंबई पहुंच गए महाराज।।

वालकेश्वर में जाकर ठहरे, सेवा करते सेवक लाल।

मत-पंथों का खंडन कीन्हा, सारा शहर गया दह्लाए।।

जीवन जी गोस्वामी रहता, धूर्त मंडली का सरदार।

किस विधि हनन होय स्वामी का, करता हरदम यही विचार।।

सेवक एक बलदेव ऋषि का, जो लालच में लिया फसाए।

जहर मिठाई उसको दीन्ही, रुपया ठहरा एक हजार।।

कान भनक स्वामी के पड़ गई और बलदेव को लिया बुलाए।

सेवक थर-थर कांपन लागा, दयानंद दीन्ही फटकार।।

जिसकी रक्षा ईश्वर करता, उसको मार न सका कोय।

पासा पलट जाए दुश्मन के, उसको बाल न बाका होय।।

कृष्णाराम जी इच्छाराम को, लेखन कार्य दिया समझाए।

विद्या पढ़ते लेखन करते, मन में श्रद्धा रही समाए।।

वेदान्त ज्ञान की पोल खुल गई, सुन सुन तर्कों की बौछार।

ब्रहमचारी बाबा बलदेव थे, शारीरिक बल के भंडार।।

प्रतिमा पूजन उचित कर्म नहीं, स्वामी जी देते समझाए।

बहुत से समझदार लोगों ने प्रतिमा जल में दई बहाए।।