27. सुंदर रूप मोहिनी शक्ति

27 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- स्वामी को बदनाम करने के लिए पाखंडियों ने कैसे-कैसे हथकंडे अपनाए। श्री महाराज के दर्शन मात्र से एक दुराचारिणी महिला का उद्धार हो गया। बाल ब्रह्मचारी दयानंद जी के रूप का वर्णन सुनिए, कैसी है उनकी सूरत और सीरत?

लामिनी चौक :-

सुंदर रूप मोहिनी शक्ति नेत्र विशाल कमल मुख जैसा।

उन्नत नक् भौंह अति सुंदर, विकसित भाल चंद्रमा जैसा।।

बलिष्ठ सुडौल गात था उनका, कदली स्तंभ भांति जंघा थी।।

करुणा वर्ण नख शोभा देते, त प्त ताम्र की प्रतिमा थी।

अंग-प्रत्यंग रूप अति मोहक, मुख पर तेजस्विनी घटा थी।।

कोमल हृदय सिंह गर्जना, दुर्मति दानव डरते थे।

वाणी से माधुर्य छलकता, सज्जन गद-गद होते थे।।

वार्ता :- मथुरा वृन्दावन में अपनी धवल कीर्ति की पताका फहराने के बाद स्वामी पुनः काशी नगरी के लिए प्रस्थान करते हैं। प्रयाग में कुछ दिन रूककर धर्म प्रचार करते हैं।

दोहा :-

इलाहबाद में चल रहा, एक दिन वाद-विवाद।

काशीनाथ शास्त्री कही, अंधकार वश बात।।

तर्ज राधेश्याम :-

सारे भारत वर्ष में, क्यों इधर-उधर फिरते हो।

किस प्रयोजन के लिए, तुम कोलाहल करते हो।।

वार्ता :- स्वामी जी कितना सुन्दर उत्तर देते हैं?

तर्ज बारहमासी :-

देश की दशा बिगड़ गई है,

महाभारत के बाद धर्म की गरिमा घट गई है।

घटा अधर्म की छाई है,

मत-पंथों की वजह हृदय में कटुता आई है।

वेद का पढना छूट गया,

सच्चिदानंद स्वरूप से देखो नाता टूट गया।

समय कैसा दुःख दाई है,

प्रतिमा पूजन से बुद्धि में जड़ता आई है।

झूठ का व्रत सबने लीन्हा,

सत्यासत्य जानने का संकल्प छोड़ दीन्हा।

रात दिन चिन्तित रहता हूं,

रक्षा हेतु धर्म की मैं कोलाहल करता हूं।