26. कलकत्ता में जिस समय

26 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- अनेक स्थानों पर वैदिक धर्म का प्रचार करते हुए स्वामी जी बिहार से बंग प्रदेश की ओर गए। पटना में एक दिन एक मैथिली ब्राह्मण ने श्री महाराज से कहा-७आप भागवत का व्यर्थ खंडन करते हो, उसमें अठारह हजार श्लोक हैं। आज तक किसी की सामर्थ्य नहीं हुई जो ऐसे श्लोकों की रचना कर सके। स्वामी जी ने हंसकर कहा कि हम ऐसे अड़तीस हजार कल्पित श्लोक बना सकते हैं। तत्काल दस श्लोक बनाकर दिए। जिससे वह ब्राह्मण चकित हो गया। स्वामीजी कलकत्ता शहर पहुंचकर प्रचार कार्य में लग जाते हैं।

दोहा :-

कलकत्ता में जिस समय पहुंचे थे श्रीमान।

ब्रह्म समाज का शहर में होता था गुणगान।।

हेमचंद चक्रवर्ती ठाकुर प्रसन्न कुमार।

स्वामी जी की भक्ति में श्रद्धा विपुल अपार।।

तोड :-

ईश्वरचंद विद्यासागर जी मिलने को आते थे।

बाबू केशवचंद धर्म की चर्चा चलाते थे।।

वार्ता :- महाराज अति सरल शैली में संस्कृत भाषा में व्याख्यान दिया करते थे। पश्चिमी ज्ञान में पारंगत ब्रह्म समाज के लोग स्वामी जी के तर्क से, युक्तियों से, द्रष्टांतों और प्रमाणों से परमहंस के वैज्ञानिक, आत्मिक बल को जानकर आश्चर्य करने लगे। तीन माह तक कलकत्ता निवासियों को अमृत पान कराके पटना, बनारस, इलाहबाद, फर्रुखाबाद, अलीगढ होते हुए मथुरा नगरी पहुँचते हैं।

शेर :-

गोउ हत्या बंदी होए, लाट कार्सन से मिलते थे।

सर सैयद अहमद खान, ऋषि से बहस रोज करते थे।।

ाग धमाल :-

मथुरा पंहुच जाए महाराज, नींद पंडों की उड़ गई है। टेक मथुरा..

फाल्गुन सुद एकादश का दिन,

मलूकदास का राधा उपवन ।

जाए ऋषि ने डेरा डाला,

उड़ गए होश देखकर ज्वाला   

कंठी तिलक मूर्ति पूजा की पोल खोल दई है। मथुरा..

काशी से संदेश पंहुच गए,

रंगाचार्य के होश उड़ गए ।

शास्त्र समर से खुद को बचाया,

बीमारी का ढोंग रचाया ।

कैसे भगाए दयानंद को चिंता बढ गई है । मथुरा..

सब मिल बैठ मशवरा कीन्हा,

कपट कुचल सहारा लीन्हा ।

दुराचारिणी एक महिला को,

लालच दीन्हा उस अबला को ।

दयानंद के पास कहो, मेरी इज्जत लुट गई है । मथुरा..

त्रिया चली चरित्र दिखाने,

ब्रह्मचारी का मन घटाने ।

ध्यानागत स्वामी को पाया,

तेज देख माथा चकराया ।

कापें गात पाप के भय से उसकी घिग्घी बांध गई है । मथुरा..

नैनन बहे अश्रु की धारा,

रोए-रोए यूं वचन उचारा ।

रंगाचार्य ने जाल बिछाया,

लालच ने मुझको बहकाया ।

भगवन क्षमा मुझे कर दीजे, मेरी आखें खुल गई हैं । मथुरा..