25. तन के टुकड़े को माँ ने

25 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :-एक दिन स्वामी जी महाराज गंगा के तट पर बैठे प्रकृति के सौंदर्य को निहार रहे थे कि एक स्त्री अपने मृत बच्चे को गोद में लिए गंगा तट पर आकर बच्चे के कलेवर को तो गंगा में बहा देती है, परंतु कफ़न जो साड़ी फाड़कर बनाया था उसे अपने साथ ले जाती है। इस घटना को देखकर स्वामी जी का दिल दहल गया।

बहर तबील :-

तन के टुकड़े को माँ ने दिया सौप जल,

पर कफ़न को न पहना सकी थी उसे।

जीर्ण साड़ी का टुकड़ा गई साथ ले,

ऐसी घटना ने बनाया व्याकुल उसे।

बहिन चाचा की मृत्यु पर रोया नहीं,

पिता-माता ने निष्ठुर बताया उसे।

सुख सुविधा से संपन्न गृह त्यागते,

कोई बंधन नहीं बांध पाया उसे।

वार्ता :- दीन दुखी और अबलाओं के प्रति स्वामी जी महाराज हमेशा चिन्तित रहा करते थे । सच्चे प्रभु भक्त की यही निशानी है। स्वामी महाराज वेद का डंका बजाते हुए कासगंज की ओर चलते हैं।

वीर छंद :-

काशी और प्रयाग घूमकर कासगंज कीन्हा प्रस्थान।

वैदिक शाला चलें किस तरह, मन में था ये लक्ष्य महान।।

सोरों घाट पर धूम मचा के, राम घाट पहुंचे महाराज।

नगर-नगर और डगर-डगर में, गूंजे स्वामी की आवाज।।

साठ गाँव थे रजपूतों के छलेसर पहुंच गए श्रीमान।

ठाकुर मुकुन्दसिंह ने उनका, जी भर के कीन्हा सम्मान।।

गायत्री संध्या वंदन की,युक्ति दी सबको समझाए।

ज्ञान की ज्योति जगी मन मंदिर, प्रतिमा जल में दई बहाए।

रमता जोगी बहता पानी, इनके रुके कींच है जाए।।

चैत्र सुदी राम नवमी को, पूर्व दिशि कीन्हा प्रस्थान।

जमालपुर मुंगेर विचरते, भागलपुर पहुंचे श्रीमान।।

गंग किनारे भागलपुर में, मेला का सुनिए अहवाल।

कन्याओं का दान ले रहे, पण्डे हो रहे मालामाल।।

देख दुर्दशा आर्य जाती की, व्याकुल भाए ऋषि उस रात।

खानपान सब नींद बिसर गई, चिन्तित मन पल-पल अकुलात।।