24. जिसने जीवन दिया

24 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- काशी शास्त्रार्थ में दयानंद की विजय वैजयंती का समाचार प्रत्नकमर नंदिनी, रुहेल खंड समाचार और ज्ञान प्रदायिनी पत्रिकाओं में छपा हुआ है। अब पौराणिक मत की राजधानी काशी को फतह कर स्वामी जी ने प्रयाग के लिए कूच कर दिया।

बहर तबील :-

जिसने जीवन दिया लोक हित के लिए,

उस ऋषि को हलाहल पिलाया गया।

ईंट पत्थर की बोछार उन पर हुई,

रात्रि निद्रा में उनको सताया गया। (१)

घोर पाखंड के जाल में देश था,

और गुलामी के बन्धन में जकड़ा हुआ था।

ज्ञान ज्योति से घर-घर को रौशन किया,

हर बसेरे से उसको हटाया गया। (२)

वार्ता :- लोक कल्याण के क्या-क्या कष्ट सहे ऋषि दयानंद उपकारों के बोझ हमें चुकाना है।

बहर तबील :-

मृत प्राय भारत को जीवन दिया,

जड़ अधर्म की काटी बड़े यत्न से।

दुष्ट वचनों से अपमान पल-पल सहा,

गंग धारा में उनको डुबाया गया। (३)

दीन दुःखयों का ऐसा मसीहा बना,

वैसा अब तक जहां में न कोई हुआ।

सम विचारों का जयघोष उसने दिया,

उसका बदला न हमसे चुकाया गया। (४)

एक अबला की घटना घटी देखकर,

अश्रु आँखों से बहने लगे गंग पर।

जिसके हृदय में करुणा का सागर बहे,

उस महात्मा को पग-पग सताया गया। (५)