23. झूठ का सहारा लेके

23 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता –कार्तिक सुदी द्वादशी मंगलवार के दिन प्रातः काल से ही विचित्र हलचल मच गई । विश्वनाथ दुर्गा आदि मंदिरों की प्रार्थनाएं, न्याय की पंक्तियां व्याकरण की भाषा, वेदांत की कोटियां और चातुर्य की अनेक चले भी स्वामी दयानंद के सामने व्यर्थ साबित हुईं।

चौक :-

झूठ का सहारा लेके कपट जाल बुनने लगे,

हार ही को जीत मान खुशियां मनाने लगे।

दुर्व्यवहार दुर्वचन बोल-बोल थक गए,

ईट पत्थर गोबर की बरसात करने लगे ।

वार्ता :- पंडित ईश्वररीसिंह निर्मल संत वेदांत के एक विद्वान काशी में रहते थे। जब उनहोंने देखा कि पंडितों की हार  होने के बाद भी अपनी जीत का जयजयकार कर रहे हैं, तो उन्होंने सोचा महा निरादर, घोर अपमान से, विपरीत नीति, निष्ठुर अन्याय से अगर दयानंद का चित्त

विचलित नहीं हुआ होगा तो वह एक सच्चा ब्रह्मज्ञानी और पहुंचा हुआ महात्मा है। और वे महाराज दयानंद की परीक्षा करके कहते हैं।

चौबोला :-

पंडित इश्वरीसिंह निर्मले ज्ञानी संत कहाते।

दयानंद की धैर्य परीक्षा की वे कथा सुनाते।।

तर्ज बारहमासी :-

दयानंद ईश्वर विश्वासी।

धर्मादि गुणों की खान, जगत में पावन संन्यासी।।

लोक निंदा का त्याग किया।

सत्य का दीप जलाने का, संकल्प ठान लिया।।

छटा मुख मंडल पर छाई।

इतने बड़े हादसे की नहीं लीक नजर आई।।

हृदय में साहस था भारी।

वे वीतराग श्री सिद्धि पुरुष हैं जग में बलिहारी।।

ज्ञान से जीत गई काशी ।

धर्मादी गुणों की खान जगत में पावन संन्यासी ।।

तोड़ :-

दीन्ही काशी में ललकार, होश पंडों के उड़ गए हैं। होश..