20. सोरों पहुंच गए महाराज

20 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- गुरुवर विरजानंद जी की मृत्यु का जैसे समाचार दयानंद जी महाराज ने सुना, अनायास ही उनके मुख से ये शब्द निकले कि ‘‘आज व्याकरण का सूर्य अस्त हो गया।’’ उन्ही दिनों वै। रामदयाल जी चौबे स्वामी जी से मिलने आए और कहा कि ग्वालियर का एक पंडित मुझे कचुरा में मिला कहता था कि मेरे पास कालीदास रचित संजीवनी नाम की पुस्तक है। जिसमे लिखा है कि महाभारत में ग्यारह हजार श्लोक है। और दस पुराणों की विद्यमानता स्वीकार की गई है। जबकि इस समय महाभारत की श्लोक संख्या एक लाख से ज्यादा और पुराण अठारह या चौबीस तक हैं। स्वामी सोरों पहुंचकर प्रचार कार्य में तत्पर होते हैं।

र.हा.-

सोरों पहुंच गए महाराज,

वहां पण्डों पर गिर गई गाज,

कैसे बचे हमारी लाज ऋषि के फंदे से।

कपट कुचाली पंडितों ने मिल विचार किया।

कैसे-कैसे हथकंडों से दयानंद पर वार किया।।

दुष्ट जन उनसे सबही हारे,

गर्दन झुकी शर्म के मारे,

दिन में देखन लगे सितारे। ऋषि के..

हीरा वल्लभ अम्बादत जी समर भूमि से भाग गए।

हलधर जी ओझा ने आकर अपने झंडे गाड़ दीए।।

हार ओझा की हुई मढ़ी पर,

मूर्छित होकर गिरा जमीं पर,

न ऐसी देखि हर कहीं पर। ऋषि के..

वार्ता :- ’’भगवत चर्चा में स्वामीजी बताया कि सन १६०० ई. के लगभग बंगाल प्रान्त के मक्सूदाबाद परगणे के शक्तिपुर ग्राम के निवासी बोपदेव और जयदेव भाइयों ने भागवत पुराण की रचना की है। लोग व्यास के नाम से प्रचारित करते हैं जो मिथ्या है । दयानंद जी महाराज सोरों से कानपूर पहुँचते हैं।

कवित्त :-

कानपूर जाए ऋषि गंग के किनारे देखो,

भैरव घाट पहुंचकर आसन लगाए दियो।

वैदिक आठ सत्यों का विज्ञापन छ्पायकर,

गली-गली दूर-दूर शहर में लगाए दियो।

सत्य का प्रचार देख पोप लोग डर गए,

ऋषि के उखाड़ने का सबने विचार कियो।

बातों के विवाद में दयानंद हार गयो,

चारों ओर झूठ का ही, जोरों से प्रचार कियो।