20. यः प्राणतो.. १..!!

यः प्राणतो निमिषतो महित्वैक ऽ इद्राजा जगतो बभूव। य ऽ ईशे ऽ अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम।। 4।।

जो प्राणवाले और अप्राणिरूप जगत् का अपनी अनन्त महिमा से एक ही विराजमान राजा है। जो इस मनुष्यादि और गौ आदि प्राणियों के शरीर की रचना करता है। हम लोग उस सुखस्वरूप सकल ऐश्वर्य के देनेहारे परमात्मा की उपासना अर्थात् अपनी सकल उत्तम सामग्री को उसकी आज्ञापालन में समर्पित करके उसकी विशेष भक्ति करें।

जो अनन्त महिमा से अपनी, जड़-जंगम का है अधिराज।

रचित और शासित हैं जिससे, जगतिभर का जीव समाज।।

जिसके बल विक्रम का यश का, कण-कण करता जयजयकार।

सुखमय उसी देव का हवि से, यजन करें हम बारंबार।।