17. भारत की शान निराली

17 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

चौकझड़ :-

भारत की शान निराली, इस पर पड़ गई छाया काली।

गौ वंश की है बदहाली, इनकी कौन करे रखवाली।।

धर्म की काट रहे हम डाली, उपवन उजड़ गया बिन माली।

वेद माता की करो बहाली, चमन में फिर आए खुशहाली।

दयानंद का वचन, सत्य का कथन, सुनके चितलाई।

जिसने भी मानी सीख-बनौ सुखदाई।

वार्ता :- राजपूतों की भूमि कर्णवास में आकर महाराज ने कुरीतियों का खंडन कर गायत्री   महिमा पर उपदेश देना आरंभ कर दिया।

चौकझड़ :-

स्वामी कार्णवास में आए, नगर के ठाकुर अति हरषाए।

जाकर सबने शीष झुकाए, संत ने वैदिक वचन सुनाए।।

बारहमासी :-

वहां एक हंसा ठकुरानी,

नब्बे वर्ष की उम्र नगर की जानी पहिचानी।

सभी करते आदर भारी,

कई गांव की स्वामिन बनकर करती सरदारी।

ऋषि के दर्शन को आई,

भूमि पर धर शीश प्रेम मन मंदिर हरषाई।

भक्त का भाव जान लियो,

गायत्री उपदेश ऋषि ने माता को दियो।

वहां एक हिरा वल्लभ था,

शास्त्रार्थ निपुण दर्शनों का वह पंडित था।

द्वंद्व छः दिन तक था जारी,

हुई ऋषि की विजय सत्य का पक्ष पड़ा भारी।

धन्य नर नारी बोल रहे,

है निराकार भगवान मूर्ति जल में फेंक रहे।

नगर में कोलाहल भारी,

रास मंडली की जोरों से होने लगी त्यारी।

कर्णसिंह कर्णवास आए।

रास देखने दयानंद को न्योता भिजवाए।