16. वेद ज्ञान की देखों

16 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- जिस महात्मा ने ‘‘मौनात्सत्यं विशिष्यते’’ अर्थात चुप्पी साधने से सत्य बोलना उत्तम है यह पाठ पढ़ा हो वह कब तक मौन रह सकता है? हरिद्वार में एक दिन स्वामी जी की कुटिया पर एक मनुष्य ने ‘‘निगम कल्पतरोर्गलितं फलम्’’ वेद से भगवत उत्तम है उच्चारण किया। यह वाक्य सुनते ही उन्होंने मौन व्रत तोड़ दिया और लगे भगवत का खंडन करने। अब स्वामी जी प्रबल वेग से मतमतान्तरों का खंडन करने लगे। चहुँ ओर उनके तर्क बाणों की वर्षा होने लगी ।

रसिया ताल :-

वेद ज्ञान की देखों, मुरलिया बाज रही।। टेक

शूर वीर दिग्गज महा पंडित, उनके मत को कीन्हा खंडित,

ओेम् की ज्योति जगाए। मुरलिया..

कई बार विष अमृत कीन्हा, क्षमा दान सबको दे दीन्हा,

दयावान गुणधाम। मुरलिया..

पाखंडों का जाल बिछा था, उसे तोड़ना बड़ा कठिन था,

तर्क दिए आसान। मुरलिया..

अंधकार में देश सो रहा, आर्य जाति का पतन हो रहा,

उसको दिया जगाए। मुरलिया..

अवतारों की धूम मची थी, जिनके दम पर कौम बटी थी,

ईश्वर एक महान। मुरलिया..

वार्ता :- दयानंद जी महाराज फर्रुखाबाद, सोरोघाट, रामघाट, राजघाट, बैलोन में प्रचार करते अनूपशहर पधारे। प. इन्द्रमन जी उनके परम भक्त बन गए, खंडन के कारण स्वामी जी पर अनेक प्राणलेवा हमले होते रहते थे। एक दिन इन्द्रमन कहने लगे।

दोहा :-

इन्द्रमन कहने लगे तुम अवधूत महान।

खंडन-मंडान के झगड़े में क्यों पड़ते श्रीमान ?।।

कवित्त :-

पाखंड कुरीतियों के जाल में फंसा है देश,

चारों ओर अविद्या रूपी अन्धकार छायो है।

शूरवीर रणवीर सब ही गुलाम बने,

ब्राह्मणों का ज्ञान कुछ काम नहीं आयौ है।।

आपस की फूट से विदेशी सरताज बने,

दीन-हीन भारत का दुखड़ा सुनायो है।

देश के सुधारने की गुरु से प्रतिज्ञा किन्ही,

वेद का ही ज्ञान मैंने सबको बतायो है।।