15. महाकुंभ की देख दुर्दशा

15 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- आगरा, ग्वालियर, जयपुर, पुष्कर और अजमेर आदि स्थानों में जाकर उन्हें प्रत्यक्ष हो गया था कि पण्डित पुरोहित जन अपने पुरातन पुरुषों के पौरुष को खो चुके हैं। इसलिए हरिद्वार का कुंभ मेला ही उनकी आशा की किरण था। क्योंकि वहां आने वाले साधू संन्यासी लोग घर बार त्यागी, लोभ मोह से दूर, ब्रह्मलीन आत्मज्ञानी, समदृष्टि हैं। यदि वे जागृत होकर सत्य के सहायक बन जाएं तो आर्य संतान के दुःख दारिद्र दूर हो जाएं। इसके भाग्य का चन्द्रमा विश्व में चमकने लगेगा। सारा बल लगाने के बाद भी उस महा मेले में उन्हें एक भी ऐसा साधु संत न मिला जो सत्य का साथ देता । स्वामीजी का मन इतना व्यथित हुआ कि उन्होंने पुस्तकें त्यागकर तन पर राख रमा ली, कौपीन मात्र धारी मौनावलम्बी बन गए। और क्या-क्या सोचने लगे।

वीर छन्द :-

महाकुंभ की देख दुर्दशा, दयानंद मन करे विचार।

भांति-भांति के मत पंथों ने, आर्य जाति का किया विनाश।।

स्वाभिमान मिट्टी में मिल गया, कायर, वीरों की संतान।

साधु संत और वैरागी, मस्ती में दिन रहे बिताए।।

प्रभु नाम का मिला आसरा, मौज -मजे का है व्यापार।

गांजा, भांग और चरस का, हरदम रहता भूत सवार।।

मन मंदिर का दर्पण मैला, घोर अविद्या का अंधकार।

सत्य ज्ञान के बने विरोधी, पाखंडों की है भरमार।।

घोर निराशा हुई ऋषि को, मन का कमल गया मुरझाए।

इतने बड़े संत मेला में, कोई नहीं मिला सत्य अवतार।।

मेरी बात सुने ना कोई, क्यों जीवन को रहा खपाए।

मौन साध लिया दयानंद ने, मन की ज्वाला दई दबाए।।

इससे तो अच्छा प्रभु नाम की, माला जपूं शिखर पर जाए।

अंत समय पर हिम खण्डों में, अपने प्राण देऊं बिसराए।।

भागीरथी की कल-कल प्यारी, ऋषि को रह रही बतलाए।

गति निरंतर शुभ कर्मों की, इससे होए विश्व कल्याण।।