14. हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे.. २..!!

हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक ऽ आसीत्। स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।। 2।। (यजु.अ.13/मं.4)

       जो स्वप्रकाश स्वरूप और जिसने प्रकाश करनेहारे सूर्य चन्द्रमादि पदार्थ उत्पन्न करके धारण किए हैं। जो उत्पन्न हुए सम्पूर्ण जगत् का प्रसिद्ध स्वामी एक ही चेतन स्वरूप था। जो सब जगत् के उत्पन्न होने से पूर्व वर्तमान था। सो इस भूमि और सूर्यादि का धारण कर रहा है। हम लोग उस सुखस्वरूप शुद्ध परमात्मा के लिए ग्रहण करने योग्य योगाभ्यास और अतिप्रेम से विशेष भक्ति किया करें।

छिपे हुए थे जिसके भीतर, नभ में तेजोमय दिनमान।

एक मात्र स्वामी भूतों का, सुप्रसिद्ध चिद्रूप महान्।।

धारण वह ही किए धरा को, सूर्यलोक का भी आधार।

सुखमय उसी देव का हवि से, यजन करें हम बारंबार।।