14. देखो हरिद्वार में जाए

14 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता-हरिद्वार में पाखंड खंडिनी पताका फहराकर, धर्म के नाम पर व्याप्त कुरीतियों का पुरजोर खंडन करना शुरु कर दिया है।

तर्ज लांगुरिया :-

देखो हरिद्वार में जाए, ऋषि ने गंगा उलट दई।।

सप्त स्रोत पर जाय, गाड़ पाखण्ड खण्डिनी दीन्ही।

पौराणिक पोपों के ढोल की पोल खोल दीन्ही।।

प्रतिमा पूजन का खंडन कर धारा पलट दई।। देखो..

पुराण व्यास ने नहीं रचे हैं, वे थे वेद के ज्ञाता।

मिथ्या गन्दी बातों का ये बना पोल खाता।।

ईश्वर इनसे नहीं मिलेगा, बुद्धि नष्ट भई।। देखो..

गंगा में स्नान करे से पाप नहीं छूटेगा।

श्राद्ध का भोजन मरे पितर को कभी नहीं पहुंचेगा।।

पैगम्बर अवतार मसीहा, सबकी खबर लई।। देखो..

भांति-भांति के संत पधारे, लम्बे तिलक लगाए।

इनकी कलि करतूतों ने क्या-क्या  जल बिछाए।।

देश हुआ कमजोर, धर्म की हालत बिगड़ गई।। देखो..

शंखासुर वेदों को ले गया, पंडित कहते थे हर बार।

जो कुछ हमने बता दिया है, वही वेद विद्या का सार।।

वेदों का सन्मार्ग दिखा के युक्ति पलट दई।। देखो..