12. मन में निश्चय कर लिया

12 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- दयानंद अगर गुरुदक्षिणा देना है तो सुनो! देश में मतमतान्तरों के कारण कुरीतियां प्रचलित हो गई हैं, उनका निवारण करो । आर्य जनता की बिगड़ी दशा सुधारो । आर्य संतान का उपकार  करो । ऋषि शैली प्रचलित करके वैदिक ग्रंथों के पठन-पाठन में लोगों को प्रवृत्तिशील बनाओ, यही गुरु दक्षिणा मुझे दान करो । दयानन्द जी को स्वामी विरजानंद जी ने अंतिम बात कही ‘‘दयानंद स्मरण रखना मनुष्य कृत ग्रंथों में परमात्मा और ऋषि मुनियों की निंदा भरी पड़ी है । परंतु आर्ष ग्रंथों में इस दोष का लेश भी नहीं । इस

कसौटी को हाथ से कभी मत छोड़ना ।’’

दोहा :-

मन में निश्चय कर लिया जीवन दाव लगाए ।

   बिगुल सत्य का बज गया शहर आगरा जाए ।।

राग रागिनी :-

दयानंद वहां आए, प्रथम गीता के रहस्य बताए,

कुंजी वेद ज्ञान की लाए । सत्य की ज्योति जली। टेक

भैरव मंदिर के निकट, ऋषि आसन लगाए दियो।

पंडित सुंदरलाल जी ने, आकर के प्रणाम कियो।।

भक्तों की मण्डली आई, सुनकर वचन रहे हरषाई,

देखा ऐसा नहीं, गुसाई, झूठ की पोल खुली। दयानंद..

बड़े-बड़े दिग्गजों ने मूर्ति पूजा छोद दीन्ही।।

निराकार ईश्वर ही के ध्यान में शरण लीन्ही।।

शहर ग्वालियर आए, पंडित पोप सभी घबड़ाए,

भागवत पाठ में दोष गिनाए, ऋषि की धूम मची।  दयानंद..

पादरी रॉबिन्सन ने, अजमेर में यूं प्रश्न किया।

अपनी ही पुत्री से काहे, ब्रह्मा ने व्यभिचार किया।।

गलत इतिहास बताया, जिसमे मिथ्या दोष लगाया,

लालच देकर ग्रन्थ रचाया, घटना नहीं घटी। दयानंद..

कर्नल ब्रुक के साथ गौ रक्षा पर विचार किया।।

गौ वंश की रक्षा हित, गौ महिमा का प्रचार किया।

गाय जन-जन हितकारी, सुनो भारत के नर और नारी,

जिस पर निश-दिन चले कटारी, छाती जाए फटी। दयानंद..

लामिनी :-

तीन साल के बाद दयानंद फिर मथुरा में आए हैं।

मलमल थान एक स्वर्ण मुद्रा, गुरुसेवा में लाए हैं।।

विजय दुन्दुभी बजी शिष्य की, गुरुवार मन हरषाए हैं।

सिर पर हाथ फेर पुलकित भए, स्वस्ति भव दरशाए हैं।।