10. अन्दर से पूछे गुरु

10 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता : –दण्डी स्वामी विरजानंद जी व्याकरण एवं वेदादि के उद्भट विद्वान थे । वे प्रज्ञाचक्षु थे। पांच साल की आयु में ही शीतला रोग से उनकी आँखों की रोशनी चली गई थी। कुशाग्र बुद्धि के धनी विरजानंद की समरण शक्ति इतनी प्रबल थी, कि एक बार सुनकर ही कंठस्थ कर लेते थे। मथुरा नगरी में जाकर दयानंद जी कुटिया का द्वार खटखटाते हैं।

दोहा :-

अन्दर से पूछे गुरु, कौन धाम क्या नाम?

किस कारण आना हुआ, क्या तेरी पहचान?

दयानंद

यही जानने के लिए, आय हूं गुरु पास।

ज्ञान पिपासा की मुझे, लग रही भारी प्यास।।

लामिनी :-

सुनकर ऐसे वचन गुरु को, मन मंदिर हर्षायो है।

बहुत दिनों के बाद हृदय में, प्रेम भाव भरी आयो है।।

तुरंत ही खोले द्वार प्रभु ने, कैसा मिलन कराओ है।

चक्षु हीन श्री विरजानंद थे, रूप नजर नहीं आयौ है।

वार्ता :- विरजानंदजी ने परीक्षा रीति पर दयानंद जी से कुछ प्रश्न पूछे। उत्तर मिलने पर बोले, अब तक तुमने अनार्ष ग्रंथों का अध्ययन किया है। जब तक तक तुम अनार्ष शैली का परित्याग नहीं करोगे, तब तक आर्ष ग्रंथों का महत्त्व और मर्म समझ नहीं पाओगे ।

वीर छन्द :-

क्या-क्या ग्रन्थ पढ़े हैं तुमने वो सब हमें देऊ बतालाए।

सारस्वत सिद्धांत कौमुदी का विवरण दीन्हा समझाए।।

इन्हें त्याग दो मन से अपने, पिछला ज्ञान देऊ विसराए।

अनार्ष ग्रंथों के अध्ययन से बुद्धि भ्रम युक्त है जाए।।

अति उमंग से कहे दयानंद, गुरु चरणों में शीर्ष झुकाए।

जो कुछ आज्ञा होय गुरु की सेवक पालन को तैयार।।

गुरु शिष्य के हृदय मिल गए, कठिन तपस्या का परिणाम।

विरजानंद ने दयानंद को सारे रहस्य दीए समझाए।।

तोड़ :-

मेरी प्रभू ने सुनी पुकार शिष्य बाद भागी आयौ है।

वार्ता :- कहते है दण्डी स्वामी महाराज जी अनार्ष ग्रंथों से इतने चिढ़ते थे कि सिद्धांत कौमुदी के संपादक भट्टोजी दीक्षित के नाम पर शिष्यों से जूता लगवाया करते थे। यह कार्य दयानंद जी से भी करवाया फिर उन्हें शिक्षा दी। दिन ब दिन दयानंद जी की योग्यता और प्रतिभा की सर्वत्र प्रशंसा होने लगी।

छन्द कवित्त :-

साधू संत मंडली में, विजया के अखाड़ों में,

चारों ओर धूम, दयानंद की ही छाई है।

मथुरा के हाट-पाट, जमुना के घाट-घाट,

तर्क बुद्धि पांडित्य की, चर्चा चलाई है।।

योगी यती बहुत देखे, देखा नहीं ऐसा और,

ब्रह्म तेज चेहरे पर, रहा दमकाई है।

विद्या में निपुण बल-तेज के पुजारी वह,

शीलता और धीरता का सच्चा अनुयाई है।।

फड़ :-

दयानंद की सीरत पर मगन भई मथुरा सारी,

ब्रह्मचर्य की महिमा को सराय रहे नर और नारी।

धन्य धन्य यों कहे, नगर के वासी,

चंदा सौ चमके रुप लगे पूरनमासी।