09. हिमालय की दुर्गम

9 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- मेला के भारी कोलाहल से दूर स्वामीजी हिमालय की दुर्गम यात्रा पर निकल पड़े ऋषिके, गुप्तकाशी गौरीकुंड, भीमगुफा, केदारनाथ, बद्रीनाथ आदि स्थानों पर अनेक साधू संतों के संपर्क में आए। समागमों से बहुत कुछ स्वामीजी ने सोचा, समझा और सीखा।

कवित्त :-

हिमालय की दुर्गम पहाडियों में घूमकर,

साधू संत मंडली से बहुत कुछ पायो है।

बहुत सारे धर्म देखे, अच्छे बुरे कर्म देखे,

आपस में विरोध ने बहुत कुछ सिखायौ है।।

वामियों के ग्रन्थ पढ़े, कमियों के भेद खुले,

पाखंड के जाल में, सबको फसायौ है।

सत्य क्या है जानना जरूरी और हो गया,

सत्य के ही जानने में जीवन लगायौ है।।

वार्ता :- दयानंद जी महाराज का ओखी मठ के महंत रावल जी के साथ वेद और दर्शनों के विषय पर वार्तालाप हुआ करता था। दयानंद की प्रतिभा से रावल जी बहुत ही प्रभावित हुए, आगे क्या होता है?

दोहा :-

ओखी मठ पर जाए कर आसन दिया लगाए।

दयानंद को परख कर महंत रहा समझाए।

चौबोला :-

महंत रहा समझाए शिष्य गर मेरे बन जाओगे।।

लाखों की संपत्ति देखो स्वामी बन जाओगे।।

हो भटकना दूर उम्र भर सेवा करवाओगे।।

बात मेरी पर गौर करो नहीं पीछे पछिताओगे।।

सुनत महंत के वचन। कहे यों कथन।

दयानन्द स्वामी,

दौलत के भूखे भक्त को मिलें न अंतर्यामी।।

बारहमासी :-

पिताजी राजपुरुष मेरे,

धन दौलत की कमी न घर में नौकर बहुतेरे।

लगन मेंरे दिल एक लागी,

इसलिए सब छोड़ बना हूं बाबा बैरागी।

खोज दिन रात करूं भारी,

सत विद्या को जान मोक्ष का बन जाऊं अधिकारी।

वहां सत्संग बहुत कीन्हा,

द्रोण सागर पहुंच चित्त को निर्मल कर दीन्हा।

संत ही सब अजमाए हैं,

विरजानंद को नाम सुनत ही मन हरषाए हैं।

हृदय में प्रेम उमड़ आयो,

मथुरा नगरी जाए गुरु का द्वार खटखटायो।