09 अष्टम समुल्लासः

सत्यार्थ प्रकाश कवितामृत

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)

ओ३म्

अथ अष्टम समुल्लासः

अथ सृष्ट्याुत्पत्तिस्थितिप्रलयविषयान्

व्याख्यास्यामः

इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न।

यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अगङ् वैद यदि वा न वेद।।१।।

                        -ऋ० । म० १०। सू० १२९ । मं० ७

तम आसीत्तमसा गूलमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वंमा इदम्।

तुच्छयेनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकम्।।२।।

                        -ऋ० । म० १०। सू० १२९ । मं० ३

हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।

स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।।३।।

                        -ऋ० । म० १०। सू० १२१ । मं० १

पुरुषऽएवेद ँ् सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम्।

उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति।।४।।

                        – यजुः० अ० ३१ । मं० २ ।।

यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति।

यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद्विजिज्ञासस्व तद् ब्रह्मेति।।५।।

                        – तैत्तिरीयोपनिषद् भृगुवल्ली अनु० १

रे नर जिसने यह रची, रचना नाना रूप।

जो धारहि नाशहि प्रभु, वह भूपन को भूप।।

ईश्वर सकल सृष्अि का स्वामी, व्यापक प्रीतम अन्तर्यामी।

उत्पति स्थिति प्रलय को कर्ता, पारब्रह्म जग भर्ता धर्ता।

उसको जानो वह परमेश्वर, केवल वही एक सर्वेश्वर।

एक मात्र वह जग का नायक, अन्य नहीं कोऊ सृष्टि विधायक।

यह सब जग रचना से पूरब, अन्धकार से ढंपा अपूरब।

केवल तमसा रात्रि समाना, गगन रूप था जगत अजाना।

तुच्छ तमावृत था इकदेशी, प्रभु अनन्त व्यापक सब देशी।

निज समरथ से पुन भगवाना, रच दीना संसार महाना।

कारण से प्रभु कार्य रचाया, इस विधि सुन्दर जगत बनाया।

रे नर! प्रभु रचाने हारा, रवि शशि तारक को आधारा।

जेते जगत भये हैं पूरब, अरु जितने पुन होंय अपूरब।

अद्वितीय प्रभु उसका स्वामी, घट घट वासी अन्तर्यामी।

उत्पति से पहले था प्यारा, सब को उत्पन करने हारा।

वाका भजन करो नर प्यारे, परम दयालु प्रभु तुम्हारे।

हे नर! जग को वही बनावे, सुन्दर रचना वही रचावे।

पूर्ण पुरुष अविनाशी ईश्वर, कारण जग का वह जगदीश्वर।

जड़ चेतन सृष्टि का स्वामी, सब से न्यारा अन्तर्यामी।

भूत भविष्यत सब संसारा, इसका वही बनाने हारा।

उस ईश्वर की रचना द्वारा, पंचभूत मय हो संसारा।

जिस से जीव जगत में जावे, प९चत्त्वहुं पावे।

वा को पारब्रह्मा पहचानो, भक्ति करो अरु वा को जानो।

जन्माद्यस्य यतः।। – शारीरिक सू० अ० १ । पा० १ । सू० २

जन्म थिति अरु परलय जाते, जानन योग्य ब्रह्म वह ताते।

प्रश्न

उत्पन ईश्वर से हुआ, यह भौतिक संसार।

अथवा कोई दूसरा, है इसका करतार।।

उत्तर

है निमित्त कारण प्रभु या का, अद्भुत खेल रचाया ताका।

प्रकृति उपादान है कारण, शास्त्र करें एहि विधि निर्धारण।

प्रश्न

क्या प्रभु ने यह प्रकृति, उत्पन कीनी नांहि।

कैसे पुन उत्पन भई, कौन भेद इस मांहि।।

उत्तर

है अनादि यह प्रकृति, इसका आदि न अन्त।

कारण से पुन कार्य्य में, रचते प्रभु भगवन्त।।

प्रश्न

कितने होते द्रव्य अनादि, किस को तुम कहते हो आदि।

कौन कौन वे होंय पदारथ, जिन्हें अनादि कहें यथारथ।

उत्तर

तीन अनादि पदार्थ हैं, प्रथम ईश पुन जीव।

जग का ‘कारण’ तीसरा, आदि अंत नहीं सीव।।

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।

तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभि चाकशीति।।२।।

                        – ऋ० । म० १ । सू० १६४ । मं० २०

शा८वतीभ्यः समाभ्यः।।२।।   – यजुः० अ० ४० । मं ८

ब्रह्म जीव यह दोऊ समाना, चेतन पालनादि गुणवाना।

व्यापक व्याप्य भाव संयुक्ता, मित्र अनादि सनातन उक्ता।

कारण  रूप मूल संसारा, कार्य रूप से मिटने हारा।

तीन द्रव्य यह नित्य अनादि, इन तीनों का अन्त न आदि।

तीनों के गुण कर्म स्वभावा, नित्य अनादि अन्त न पावा।

जगत तरु पर जीव विराजे, वाके संग प्रभु पुन छाजे।

पाप पुण्य फल आतम खाये, प्रभु नहीं भोगे रमे रमाए।

सब के भीतर बहिर प्रकाशे, जल थल अगन पवन आकाशे।

आतम से परमातम न्यारा, दोनों से न्यारा संसारा।

इनको नित्य अनादि और अनातन, अजर अमर अरु नित्य पुरातन।

इसके हित प्रभु वेद रचाये, सब विद्याएं इसे सिखाए।

अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां, बह्वीः प्रजाः सृजमानां स्वरूपाः।

अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते,, जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः।।

                        -८वेता८वतरोपनिषद् अ० ४। मं० ५

जीव प्रकृति परमात्मा, तीनों को अज जान।

जग के कारण तीन यह, तीनों नित्य समान।।

अथ प्रकृति लक्षण

सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिः प्रकृतेर्महान् महतोऽहकङरोऽ

हकङरात् प९चतन्मात्राण्युभयमिन्द्रियं प९चतन्मात्रेभ्यः स्थूलभूतानि

पुरुष इति प९चविंशतिर्गणः।।       – सांख्यसूत्र अ० १। सू० ६१

सत रज तम इन का संघाता, प्रकृति नाम से वरणा जाता।

उसने महत्तत्व उपजाया, अहंकार तिस ते पुन आया।

सूक्ष्म भूत प९च तन्मात्रा, दश इन्द्रिय ग्यारस मन गात्रा।

जल थल अगन पवन आकाशा, पंचतन्मात्रा इनहुं प्रकाशा।

चतुर्विंशति सकल पदारथ, पच्चिसवां है जीव यथारथ।

प्रकृति है अविकारिणी, सब का कारण जान।

इस का ही सब कार्य है, यावत जगत महान।।

उपादान कारण पुरुष, नहीं किसी का होत।

नहीं काहू को कार्य है, चेतन आदि सरोत।।

प्रश्न

सदेव सोम्येदमग्र आसीत्।।१।।

असद्वा इदमग्र आसीत्।।२।।

आत्मा वा इदमग्र आसीत्।।३।।           – बृह० अ० १

ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्।।४।।      – शतपथ० ११ । १ । ११। १ । ४

सुन सुत श्वेतु मम वचना, अब लग जग की भयी न रचना।

तब लग सत्य असत अरु आतम, चौथा प्रव्य रहा परमातम।

चार पदारथ रचना पूरब, अन्य नहीं थी वस्तु अपूरब।

तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति।।१।।

सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेयेति।।२।।

                        – तैत्तिरीयोपनिषदृ ब्रह्मानन्दवल्ली अनु० ६

निज इच्छा से पुन प्रभु, हो गये नाना रूप।

एहि विधि यह मन हर जगत, सुन्दर बना अनूप।।

सर्वं खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन।।

यह जो लखें पदारथ नाना, सगरे ब्रह्म रूप भगवाना।

जित देखें परमातन देखें, अन्य नहीं कोउ वस्तु पेखें।

उत्तर

यह जो तुम ने कीने अर्था, भ्रम भूले सब भये अनर्था।

क्या वर्णाहिं उपनिषदें भाई, सुनहु वचन टुक ध्यान लगाई।

सोम्यान्नेन शुगङ्ेनापो मूलमन्विच्छाद्भिस्सोम्य शुगङ्ेत तेजोमूलमन्विच्छ

तेजसा सोम्य शुगङ्ेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः

सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः।।          -छान्दो० उपनि० प्र० ६ । खं० ८। मं० ४

श्वेतु केतु सुन हे सुत आरज, जल कारण अरु पृथिवी कारज।

तेज जान तू जल का कारण, ऐहि विधि मन में कर अवधारण।

तेज कार्य कारण सत मूला, यह सत प्रकृति जगत सुमूला।

जग का स्थान इसी को जानो, यही नितय है एहि विधि मानो।

सृष्टि पूर्व जग असत समाना, वर्तमान था नित्य महाना।

जीव ब्रह्म प्रकृति के माहीं, अरु अभाव था इसका नाहीं।

सब कुछ ब्रह्म ही ब्रह्म है, इस में तथ्य न जान।

भानमती के खेल में, रोड़ा ईंट जुटान।।

                        – छान्दोग्य० प्र० ३ खं० १४ मं० १

नेह नानास्ति किंचन।।      – कठोपनि० अनु० २ वल्ली० ४ मं० ११

जैसे अंग शरीर के, जब जग तनु के संग।

तब लग हैं यह काम के, तन से पृथक अपंग।।

सार्थ वाक्य अस संग प्रकरणे, बिना प्रकरणे अर्थ प्रहरणे।

अन्य वाक्य सन इसको जोड़ें, हो अनर्थ जब तोड़ मरोड़ें।

सुनहु अर्थ इसके बतलाएं, अन्तर्निहित भाव समझाएं।

अहो जीव बन ब्रह्म उपासी, जो घट घट का अन्तर्वासी।

जो प्रभु जग उत्पत्ति कर्त्ता, जीवन दाता पालक भर्ता।

जिसके सँग यह जग चरितारथ, जिसके बिन जग होय अकारथ।

उसे छोड़ जो अन्य उपासे, सो नर अपना आप विनासे।

मेल नहीं नर वस्तु का, उस चेतन के संग।

पर सब निज निज रूप में, ब्रह्मधार अभंग।।

प्रश्न

कितने कारण जगत के, जिन से है संसार।

किस क्रम से कैसे रचा, अरु किसके आधार।।

तीन सृष्टि के निश्चित कारण, उपादान निमित्त साधारण।

जो निमित्त कारण के लक्षण, सो सुनिये हे बुद्धि विलक्षण।

जिसे बनायें तो बन जाये, बिन बनाये नहीं बन पाये।

स्वयं आप नहीं बने कदापि, अन्य पदारथ रचे तथापि।

दूजा उपादान है कारण, वा को लक्षण कर निर्धारण।

जिसके बिना न कुछ बन पावे, वही बिगड़े वही बन बनावे।

बदले रूप रंग निज नाना, उपादान कारण तिंहि माना।

अब तृतीय सुन लीजे कारण, जिसको कहते हैं साधारण।

जब सृष्टि का हो प्रतिपादन, यह है प्रतिपादन को साधन।

जो निमित कारण कहा, वा के दोऊ प्रकार।

इक ईश्वर इक जीव है, चेतन जगदाधार।।

कारण से जो कार्य्य बनाता, जग का अद्भुत खेल रचाता।

वही जगत का कर्त्ता धर्त्ता, प्रलय करे सृष्टि का हर्ता।

करे जगत की वही व्यवस्था, सब की समुचित रखे अवस्था।

वह निमित्त जग का प्रभु प्यारा, रचने हारा सब संसारा।

जीवहिं कहिये दूजा कारण, हममें तुममें सर्व साधारण।

सृष्टि में से लेत पदारथ, मन माना नित रचे सकारथ।

साधारण तीसर को नामा, जो करता साधन को कामा।

जड़ परमाणु प्रकृति, बिगड़े बने न आप।

सामग्री निर्माण की, उसका सकल प्रताप।।

कोई बनाए तो बन जावे, अपने आप विकार न पावे।

जड़ भी जड़ को हैं निर्माते, यथा बीज गिर भूमि समाते।

जल पाकर तरु बनें महाना, बनें पदारथ ऐसे नाना।

नियमित बनना और बनाना, करे जीव अथवा भगवाना।

जो साधन जिस वस्तु के, रचना माँहि सहाय।

वह कारण संसार में, साधारण कहलाया।।

दर्शन ज्ञान हाथ जल जाना, दिशा काल आकाश विताना।

इत्यादिक रचना में कारण, कहलाते सगरे साधारण।

जो कुम्हार कोऊ घड़ा बनावे, सो निमित्त कारण कहलावे।

उपादान कारण है माटी, जिससे बनते करवे चाटी।

दण्ड चक्र साधन साधारण, कहलाते साधरण कारण।

दिशा काल आकाश प्रकासा, कर पद आँख कान अरु नासा।

यद्यपि यह साधन साधारण, नैमित्तिक भी है यह कारण।

कारण त्रय बिन कोई पदारथ, बने न बिगड़े वस्तु यथारथ।

प्रश्न

यह नवीन वेदान्ती, मानें इक भगवान्।।

उपादान कोई नहीं, नहीं साधन कोई आन।।

यथोर्णनाभिः सृजते गृह्वते च।      – मुण्डको० मुं० १ खं० ं मं० ७

जैसे मकड़ी बिनती जाले, अन्दर से सब तन्तु निकाले।

बाहर से कोई वस्तु न लेवे, जाल बना कर उसको सेवे।

उसमें रमती उसमें खेले, कीट पतंग पकड़ मुख मेले।

एहि विधि ईश्वर जगत रचाये, अपने में से सृष्टि बनाये।

स्वयं खेलता खेल खिलारी, उसकी अपनी मायासारी।

जब वह करे कामना प्यारा, इक से होता न्यारा न्यारा।

आप ही ब्रह्म आप ही माया, आपही आतम आप ही काया।

आप खिलारी आप तमाशा, आप ही पूरे अपनी आशा।

आदावन्ते च यन्नास्ति वर्त्तमानेऽपि तत्तथा।।

                        – गौड़पादीय का० श्लो० ३१

जो नहीं होवे आदि में, और अन्त में नाँहिं।

निश्चय वह नहीं हो सके, वर्तमान के माँहिं।।

जगत नहीं था रचना पूरब, पारब्रह्म था अवस अपूरब।

प्रलयानन्तर नहीं संसारा, केवल ब्रह्म रहे आधारा।

अब पुन जगत ब्रह्म क्यों नाहीं, वर्तमान अवसर के माहीं।

उत्तर

उपादान यदि ईश्वर जानो, तो ईश्वर सविकारी मानो।

पारब्रह्म होगा परिणामी, जनमे मरे नाश अनुगामी।

उपादान गुण कर्म स्वभावा, कारज में भी सगरे आवा।

कारणगुणपूर्वकः कार्य्यगुणो दृष्टः।।

                  – वैशेषिक सू० अ० २ आ० १ सू० २४

उपादान कारण गुण सारे, कारज में आवें अनिवारे।

ब्रह्म सच्चिदानन्द स्वरूपा, जड़ संसार असत को रूपा।

जग जनमें पर ब्रह्म अजनमा तनिक सोचिये अंतर मनमां।

जगत दृष्ट पर ब्रह्म न दीखे, प्रभु अखंड जग खंडित पेखे।

जग ब्रह्म का अन्तर भारा, कारण कारज न्यारा न्यारा।

जो जड़ जग का कारण ईश्वर, तो ईश्वर जड़ होय अनीश्वर।

पुन पृथिवी जो रही अचेतन, वह भी ईश्वर सी हो चेतन।

जो पुन दीना आपने, मकड़ी का दृष्टान्त।

वह तुमरे मन्तव्य का, बाधक होत नितान्त।।

जड़ तनु तंतु को उपजावे, उपादान जड़ पिण्ड कहावे।

केवल जीव नैमितिक कारण, करे तंतुओं का प्रस्तारण।

यह भी प्रभु की अद्भुत माया, मकड़ी ने ही जाल बनाया।

अन्य कहां समरथ कोई जन्तु, इस प्रकार जो बिनता तन्तु।

एहि विधि व्यापक पारब्रह्म, कारण प्रकृति लीन।

कारण से कारज करे, कार्य्य जगत रच दीन।।

सूक्ष्म ही से स्थूल बनाया, उसके अन्दर आप समाया।

साक्षी रहे स्वयं घट वासी, सुख स्वरूप प्रति वस्तु प्रकासी।

उत्पन्न होवे जब संसारा, तब प्रसिद्धि का होय प्रसारा।

ज्ञान ध्यान सन जीव विचारे, पारब्रह्म का नाम उचारे।

स्थूल जगत में प्रभु विलासे, अपनी महिमा आप प्रकासे।

बिन रचना तिहिं कोऊ न जाने, रचना हो तो जीव पछाने।

प्रलय बाद जब जगत नशावे, कोऊ जगत को जान न पावे।

मुक्त जीव अरु ईश्वर प्यारे, केवल रहते जानन हारे।

यह जो तुमरी कारिका, वह भी है निर्मूल।

पहले पाछे जगत को, जग जाता है भूल।

जग से पहले जग नहीं भासे, जग के पाछे किम पुन भासे।

प्रलय होय कोऊ जाने नाहीं, कार्य्य समाया कारण मांही।

तम आसीत्तमसा मूलहमग्रे।।१।।

                        – ऋ० मं० १० सू० १२१ मं० ३

आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम्।

अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः।।२।।         – मनु० १ । ५

रचना पूरव यह संसारा, आच्छादित इस पर अँधियारा।

वहाँ प्रलय में ऐसे हि होवे, तम से आवृत कोऊ न गोवे।

अगम अगोचर कोई न जाने, ज्ञान तर्क सब मिटें हिराने।

वर्तमान में जाना जाये, इन्द्रिय सन परतक्ष्य लखाये।

लिखा कारिका कारने, वर्तमान जग नाहिं।

अप्रमाण यह सर्वथा, हेतु न इस के माँहिं।।

जो प्रमाण से जाना जाता, जिंह देखे प्रत्यक्ष प्रमाता।

वा को कैसे कहें अभावा, जाको सन्मुख दर्शन पावा।

प्रश्न

क्या परयोजन प्रभु का, किया जगत निर्माण।

जग से उस को लाभ क्या, कहिये सहित प्रमाण।।

उत्तर

नहीं रचने में लाभ क्या, होता यह बतलाव।

रच कर क्या हानि हुई, यह रहस्य समझाव।।

प्रश्न

जब से प्रभु ने जगत रचाया, तब से निज आनन्द गँवाया।

सुख दुख अंदर जीव फँसाये, कहो लाभ क्या जगत बनाए।

उत्तर

दारिद नर के हैं यह बैना, उद्योगी नर कबहुं कहै ना।

प्रलय काल में भला बतायें, जीवातम क्या दुख सुख पाएं।

जो दुख सुख की तुलना कीजै, दुख थोड़ा सुख घनतर लीजै।

अनिक जीव जो जग में पावन, पारब्रह्म चिन्तन सरसावन।

जग में आय तपस्या करते, मोक्ष पाय प्रभु मांहि विचरते।

रहें प्रलय में पड़े अकारथ, सृष्टि बने तब होंय सकारथ।

प्रलय पूर्व की सृष्टि मांहि, पाप पुण्य जन जो कर पाहीं।

कर्म भोग हित जग में आवें, इस कारण प्रभु जगत बनावें।

यदि कोई तुम से पूछे भाई, ईश्वर ने क्यों आंख बनाई।

तो तुरन्त उत्तर तुम दोगे, देखे आंख रूप को भोगे।

या विधि प्रभु को जो विज्ञाना, सृष्टि करण आदिक गुणावाना।

यदि ईश्वर नहीं जगत बनाता, यह विज्ञान व्यर्थ बन जाता।

न्याय दया उसके गुण जेते, जग रचना बिन असफल तेते।

प्रभु उत्पति थिति करत विनाशा, निज समरथ को करत प्रकाशा।

नयन स्वभाविक गुण जिमि दर्शन, आंखें करती जगत आकर्षण।

एहि विधि प्रभु का गुण स्वभाविक, जगत बनावे जग का नाविक।

अगनित वस्तु जीव कहँ दाना, पर उपकार करे वह नाना।

प्रश्न

वृक्ष बना पहले कहो, अथवा पहले बीज।

बीज नहीं तो तरु नहीं, पेड़ नहीं निर्बीज।।

उत्तर

तरु से पहले बीज बनाया, बीज बिना तरु कँह से आया।

बीज निमित्त हेतु अरु कारण, यह पर्याय शब्द साधारण।

एक अर्थ के वाचक सारे, केवल पद हैं न्यारे न्यारे।

बीज नाम कारण का जानें, तांते बीजहि पहले मानें।

कारज से पहले हो कारण, तर्क शास्त्र कृत यह निर्धारण।

प्रश्न

सर्व शक्ति मय ब्रह्म है, जग का कारण प्राण।

उत्पन कर्त्ता जीव का, ऐसा करें प्रमाण।।

वह कर्त्ता सृष्टि प्रतिपादन, वही जीव करता उत्पादन।

क्यों ऐसा कर सकता नाहीं, क्या उस में यह शक्ति नाहीं।

उत्तर

जग में जो कुछ होय असम्भव, जो कर डारे वाको सम्भव।

तुम पुन उसे शक्ति मय जानो, ऐसी बात सत्य यदि मानो।

तो प्रभु जिस की करते जा, क्या वह बना सके प्रभु दूजा।

मर सकता क्या ईश तुम्हारा, क्या जड़ हो सकता प्रभु प्यारा।

अन्यायी अपवित्र कुकर्मी, क्या हो सकता ईश्वर धर्मी।

प्रभु स्वभाव के विरुध न जावे, तांते जीव न प्रभु उपजावे।

उष्ण अग्नि जिमि शीतल पानी, चंचल पवन भूमि गरुआनी।

इन के यह सब सहज स्वभावा, उलट फेर नहीं होने पावा।

नियम प्रभु के सत्य रु पूरे, मानुष के सम नहीं अधूरे।

नियम तोड़ सकता नहीं ईश्वर, नियम पूर्ण साँचा जगदीश्वर।

सब कर्मों का स्वयं विधायक, नहीं चाहिये कोउ उसे सहायक।

इन अर्थों में वह प्रभु प्यारा, सर्व शक्ति का रखने हारा।

प्रश्न

निराकार वह प्रभु है, अथवा है साकार।

इस का उत्तर दीजिये, वेद शास्त्र निर्धार।।

यदि प्रभु का कुछ नहीं आकारा, रूप पूंग रेखा से न्यारा।

बिन कर पद किम जगत रचाये, कर्म न हो बिन हाथ हिलाये।

जो मानो वाको साकारा, सब सो मिट जाय संशय सारा।

इस में पुन कोऊ दोष न आवे, साधन से सब कुछ बन जावे।

उत्तर

रूप रंग राखे नहीं ईश्वर, निराकार व्यापक जगदीश्वर।

जो उस का कछु होय अकारा, रहे न उसका सकल पसारा।

भूख प्यास अरु सरदी गरमी, दुख सुख जग की सख्ती नरमी।

छेदन भेदन पीड़ा व्याधि, जन्म मरण अरु आधि उपाधि।

व्यापें प्रभु में सभी विकारा, निर्विकार नहीं रहे सकारा।

देहवान हैं हम तुम जैसे, निर्बल होवे ईश्वर तैसे।

किम विधि प्रकृति वश में राखे, सर्व शक्ति मय को पुन भाखे।

प्रकृति सूक्ष्म स्थूल महेश्वर, कैसे जगत रचे सर्वेश्वर।

वाके कर पद नयन न काना, रखा रूप रहित भगवाना।

पर अनन्त शक्ति का स्वामी, अणु अणु व्यापक अन्तर्यामी।

निज बल से सब काम चलावें, निज शक्ति से जगत रचावें।

जीव जगत में शक्ति नाहीं, शक्ति है ईश्वर के माहीं।

पकड़ पड़ परमाणु मिलाता, इस विधि प्रभु संसार बनाता।

प्रश्न

जैसे मानुष है साकारा, कर पद आदिक रखने हारा।

वैसे ही वाकी सन्ताना, रूप रंग राखे विधि नाना।

यदि पितु की नहीं होती सूरत, सन्तति होती पुनः अमूरत।

जैसा कारण वैसा कारज, यह तो जानें सर्व साधारण।

निराकार यदि ईश्वर तेरा, जग का क्यों आकार घनेरा।

निराकार ने जगत बनाया, क्यों आकार जगत ने पाया।

निराकार जग होना चाहिये, कारण इक सम कहिये।

उत्तर

रे भाई! तुव प्र८न यह, बच्चों की सी बात।

उपादान जग का नहीं, प्रभु निमित्त है तात।।

प्रकृति स्थूल जगत की कारण, ऐसा मन में कर अवधारण।

स्थूल जगत को प्रकृति बनावे, उपादान यह प्रकृति कहावे।

निराकार प्रकृति मत मानो, स्थूल भयी सूक्षम से जानो।

सूक्षम से सूक्षम परमेश्वर, नैमित्तिक कारण सर्वेश्वर।

प्रश्न

कारण के बिन कार्य क्या, संभव है या नाहिं।

नहीं संभव तो पुनः क्या, कारण कारण मांहि।।

उत्तर

बिन कारण कारज नहीं, नहीं अभाव से भाव।

पुत्र हुआ बिन पिता के, ऐसा कहीं दिखाव।।

बांझ पूत अरु नर शिर ८ाृङ्गा, शैल उठाये शिर पर भृङ्गा।

नभ के फूल मेघ बिन वृष्टि, मात पिता बिन सुत की सृष्टि।

बिना जीभ के बोले बानी, यह सब कोरी झूठ कहानी।

तेहि विधि कारण के बिन कारज, माने मूरख मूढ़ अनारज।

प्रश्न

होय न कारज जो बिन कारण, तो कारण क्या है बिन कारण।

कारण का कारण बतलाएं, मुक्ति की उलझन सुलझाएं।

उत्तर

कार्य न बनते किसी के, जो हैं कारण रूप।

ब्रह्म नित्य कारण सदा, सृष्टि रचे अनूप।।

कारण है जो किसी का, और किसी का काज।

वह वस्तु कछु और है, जाने आप्त समाज।।

जैसे इक बिन्दु हो पानी, उस की बनती रेख समानी।

वह रेखा हो गोलाकारो, रूप भूमि का पुन वह धारे।

पुन पर्वत जंगल बन जाते, इस प्रकार प्रभु जगत रचाते।

वरं शून्य का जाननहारा, नहीं शून्य सृष्अि कर्तारा।

द्वितीय नास्तिक

हो अभाव से भाव की, उत्पति यह संसार।

गले बीज पादय बने, मन में करहु विचार।

जब कोऊ बीज भूमि मँह डारे, गले बीज जो भूमि मझारे।

जभी बीज का होय अभावा, तभी भूमि पर अँकुर आवा।

बिना बीज पुन अंकुर नाहीं, अंकुर नहीं बीज के माँहीं।

उत्पति कारण निपट अभावा, लखें भाव से कहीं न भावा।

उत्तर

व्यापक था वह बीज मँह, बीजहुँ मर्दनहार।

उत्पति हो सकती नहीं, जो न होय कर्तार।

नास्तिक कुण्डलिया

कर्म करें तो फल मिले, बिना किये नहीं पाय।

नहीं सत्य मन्तव्य यह, जग में उलट लखाय।।

जग में उलट लखाय, कर्म नर करे बेचारा।

फिर भी फल नहीं मिमले, विवश नर है दई मारा।।

तांते ईश्वर हाथ, जिसे वह चाहे देता।

फल नहीं अपने हाथ, कर्म कोई कर ले केता।।

उत्तर

बिना किये देता नहीं, सब कर्मन आधीन।

जिस नर ने जितना किया, उतना उसने लीन।।

चतुर्थ नास्तिक

निश्चय बिना निमित्त के, उत्पन हो संसार।

क्योंकर पेड़ बबूल के, होते कांटेदार।।

जब जब सृष्टि होवे उत्पन, मनुष पशु पक्षी बन उपबन।

बिन निमित्त सगरे उपजाते, नाना रूप रंग सब पाते।

उत्तर

जिससे जिसका जन्म हो, वही निमित्त पहचान।

बिन कंटकमय वृक्ष के, कांटे लगे न आन।।

पंचम नास्तिक

बिगड़े बने वस्तु जग मांही, तांते जग में थिर कछु नाहीं।

जैसे पृथिवी गृह का कारण, सकल वस्तु को करती धारण।

वह जल का पुन होती कारज, तर्क शास्त्र के कहें अचारज।

किन्तु प्रकृति कारण आदि, वह केवल इक होय अनादि।

‘‘मूले मूलाभावादमूलं मूलम्।।’’           – सांख्य सूत्र अ० १ सूत्र० ६७

जड़ की जड़ नहीं देखी भ्राता, कारण का कारण नहीं ताता।

तांते मन में कर अवधारण, सब का कारण प्रभु अकारण।

कोऊ कारण होने से पूरब, कारण त्रय हों अवश अपूरव।

जब तुमने हो वस्त्र बनाना, साधन कारण पड़ें जुटाना।

पटबिनुआ और सूत कपासी, नलकी राछ कील सण्डासी।

जब यह कारण प्रथम जुटाएं, नाना विश्व पुन वस्त्र बनाएं।

ब्रह्म प्रकृति नभ और काला, जीव अनादि सभी त्रिकाला।

पुन उपजे यह सब संसारा, महां प्रलय से जिसे उबारा।

जो उनमें से एक न होवे, प्रलय तिमिर में सृष्टि सोवें।

नास्तिकों के वचन

शून्यं तत्त्वं भावो विनश्यति वस्तुधर्मत्वाद्विनाशस्य।।१।।  – सांख्य सू०

अभावाद् भावोत्पत्तिर्नानुपमृद्य प्रादुर्भावात्।।२।। ईश्वरः कारणं

पुरुषकर्माफल्यदर्शनात्।।३।। अनिमित्ततो भावोत्पत्तिः कण्टक-

तैक्ष्ण्यादिदर्शनात्।।४।। सर्वमनित्यमुत्पत्तिविनाशधर्मकत्वात्।।५।।

सर्वं नित्यं प९चभूतनित्यत्वात्।।६।। सर्वं पृथग् भावलक्षणपृथक् त्वात्।।७।।

सर्वमभावो भावेष्वितरेतराभावसिद्धेः।।८।।

                        – न्याय सू० ।। अ० ४ । आहृि० १

नास्तिक

पहले जग था शून्य के अन्तर, शून्य रहेगा प्रलय अनन्तर।

शून्य ही केवल एक पदारथ, सब असत्य इक शून्य यथारथ।

वर्तमान में जो कछु भावा, शून्य होय जब होय अभावा।

उत्तर

शून्य नाम आकाश का, शून्य बिन्दु आकाश।

जगत् रहे इस शून्य में, जग का होय न नाश।।

जो जनमें सो मरता जग में, सब यात्री मृत्यु के मग में।

श्लोकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रन्थकोटिभिः।

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।।

उत्तर

यह प९चम वेदान्त नवीना, उनको दीखे जगत कहीं ना।

ब्रह्म सत्य जग झूठ पसारा, जीव ब्रह्म से नाहीं न्यारा।

यह है इन लोगों की बानी, स्वयं ब्रह्म बन करते हानि।

अब इसका पुन उत्तर सुनिये, सुनिये लखिये मन मँह गुनिये।

नित्य नित्यता यदि सब केरी, तब तो सब कछु नित्य रहेरी।

नित्य ब्रह्म नित सब कछु होई, नहीं अनित्य पुन होगा कोई।

प्रश्न

नित्य न सब की नित्यता, ज्यों लकड़ी मँह आग।

आग जला कर लाकड़ी, स्वयं नष्ट हो जाय।।

उत्तर

वर्तमान में जिंह लखें, वा को कहे अनित्य।

पर अनित्य कारण नहीं, वह अति सूक्ष्म नित्य।।

जो तुम सत्य ब्रह्म को मानो, उसका कारज भी सत जानो।

ब्रह्म सत्य तो सत संसारा, कारज कारण के अनुसारा।

यदि सृष्टि को कल्पित मानें, स्वप्न सर्प रज्जु वत जानें।

तौ भी यह हो सकता नाहीं, टुक सोचें अपने मन मांही।

गुण ही कल्पना मानी जावे, गुण नहीं कोऊ द्रव्य उपजावे।

गुण द्रव्यों से पृथक न रहता, न्याय शास्त्र पुन इस विध कहता।

जग यदि प्रभु की कल्पना, तो जग रहता नित्य।

कैसे उसकी कल्पना, संभव होय अनित्य।।

यदि कल्पना कहो विनाशी, तौ कारण प्रभु क्यों अविनाशी।

देखा सुना न होवे जाको, नर को स्वप्न न आवे ताको।

जागृत में हम जो कुछ देखें, उसको ही सुपने में पेखें।

जैसे गहरी निद्रा मांही, ज्ञान रहे सृष्टि का नांही।

विद्यमान सृष्टि पर होवे, निद्रा में भूला नर सोवे।

तैसे ही प्रलय बीच इक कारण, रहता है कीजे निर्धारण।

संस्कार बिन स्वप्न न सम्भव, अन्धरूप को लखे असम्भव।

जीवातम में वस्तु नाहीं, ज्ञानमात्र रहता मन मांही।

बाहर वर्तमान जग सारा, नहीं असत्य तांते संसारा।

 प्रश्न

जागृत की सब वस्तु जिमि, रहे स्वप्न में नांहि।

दोनों की पुन नहीं रहें, नशहिं सुषुप्ति मांहि।

जागृत के तिमि सभ पदारथ, मानहु सुपने तुल्य अकारथ।

जागृत स्वप्न सुषुप्ति सारे, सब नश्वर सब जाने हारे।

उत्तर

क्यों कर इस विधि मानें भाई, विद्यमान किम लखें नशाई।

स्वप्न सुषुप्ति दोनों माहीं, बाह्य जगत क्या होता नाहीं।

द्रव्यों का नहीं होत अभावा, ज्ञान मात्र आतम मँह आवा।

पीठ ओर हों यथा पदारथ, पर नहीं दिखते द्रव्य यथारथ।

पर अभाव नहीं होता तांका, नैनों ने तिनको नहीं झांका।

एहि विधि स्वप्न माहीं, निपट अभाव प्रकृति को नाहीं।

तांते जीव ब्रह्म जग कारण, तीनों निश्चित नितय निधारण।

नास्तिक

पंच भूत जब नित्य हैं, नित्य जगत तब मान।

तर्क शास्त्र यह मानता, कारण कार्य समान।।

उत्तर

सत्य नहीं यह तुमरी बाता, विनसत लखें द्रव्य दिन राता।

जेते लखहिं द्रव्य संसारे, सम्मुख बिगड़े बने तुम्हारे।

घट षष्टादि जब सभी विनाशी, पुन कैसे मानें अविनाशी।

तांते नित्य न कारण मानें, मरण शील नश्वर सब जानें।

नास्तिक

पृथक पृथक सब द्रव्य हैं, नहीं वस्तु कोऊ एक।

एक द्रव्य के बीच मँह, द्रव्य नहीं अतिरेक।।

उत्तर

द्रव्य द्रव्य के अंग में, अंगी सदा समाय।

वर्तमान आकाश प्रभु, जाति संग बसाय।।

नहीं जगत में कोऊ पदारथ, इन से होवे पृथक यथारथ।

निज निज रूप माँहि अलगावें, इस से अलग न हो पुन पावें।

नास्तिक

इतरेतरहि अभाव है, सब द्रव्यों के मांहि।

तांते सभी अभाव है, भाव किसी का नांहि।।

तुरग न गाय गाय नहीं तुरगा, डरग न मत्स्य नहीं उरगा।

इक का दूसर मांझ अभावा, तांत सगरा जगत अभावा।

उत्तर

इतरेतरहि अभाव किम, जो नहीं होवे भाव।

वस्तु वस्तु में भाव है, संभव नहीं अभाव।।

गाय गाय है घोड़ घोड़ा, नहीं गोत्व ने गौ को छोड़ा।

गाय अश्व दोनों का भावा, पुन तुम कैसे कहो अभावा।

नास्तिक

बनता जगत स्वभाव से, नहीं कोऊ रचने हार।

अन्न नीर के मिलन से, उपजें कीट अपार।।

भू जल बीज मिल हि जिहिं स्ािाने, घास पात पुन वहां उगाने।

जलधि पवन के योग तरगङ, लवणफेन रचते बहु रंगा।

हरद चून निंबु रस थोरी, तीनों मिल कर बनती रोरी।

ततव स्वाभाविक जगत बनाएं, ईश्वर को हम कहीं न पाएं।

उत्तर

जो स्वभाव से जग बन जाए, जग का नाश न होने पाए।

यदि विनाश स्वाभाविक मानो, उत्पत्ति पुन होय न जानो।

दोऊ स्वभाव यदि द्रव्यन मांही, युगपत मानो यदि इक ठाई।

तो उत्पत्ति अरु नाश व्यवस्था, नहीं रहे अस होय अवस्था।

यदि निमित्त से कहोगे, उत्पत्ति और विनास।

तो निमित्त का द्रव्य से, मानो पृथक निवास।।

यदि स्वभाव से उत्पत्ति नाशा, सब स्वभाव से तिमिर प्रकाशा।

समय व्यवस्था तौ मिट जावे, अंधा धुध जगत मँह छावे।

जो स्वभाव से उपजे आकर, तौ क्यों अनिक न होंय दिवाकर।

अनिक चन्द्र भूगोल अनेका, क्यों नबने जग बहु अतिरेका।

बने परस्पर मेल से, जग के जिते पदार्थ।

अपने आप न मिल सकें, जोड़े प्रभु यथार्थ।।

बीज अन्न जल कीड़े सारे, इन के प्रभु बनाने हारे।

बिन उस के कुछ बन नहीं पाये, प्रभु इन का संयोग मिलाए।

कहीं हरदी कहीं निंबु चूना, निज प्रयत्न से मिले कभू ना।

यथा योग्य जब कोई मिलाये, तब सुन्दर रोरी बन जाए।

अधिक वस्तु अथवा हो थोरी, अच्छी बन नहीं सकती रोरी।

एहि विधि प्रभु को प्रकृति ज्ञाना, अरु वह आने रीति मिलाना।

उस के बिन जड़ वस्तु कोई, अपने आप सुमिलन न होई।

तांते सृष्टि ईश रचावे, अपने आप न बनने पावे।

प्रश्न

जब कर्ता कोऊ नहीं था, नहीं अब है नहीं होय।

सदा काल से चल रहा, रहे चलत इम सोय।।

जगत अनादि चलता आया, नहीं किसी ने इसे बनाया।

वर्तमान मँह जैसे चाले, वैसे हि चले भविष्यत काले।

उत्तर

बिन कर्ता कोई क्रिया न सम्भव, क्रिया जन्य वा वस्तु असम्भव।

पृथिवी आदि पदारथ जेते, जग रचते संयोग भये ते।

हो सकते वे नहीं अनादि, वे कारण के कारज सादि।

जिसे बनाता है संजोगा, सो संजोग से पूर्व न होगा।

जब वियोग होवेगा ताका, पुन दर्सन नहीं होगा वाका।

कठिन कठिन तर धातु लीजे, हीरक स्वर्ण भस्म कर दीजे।

भस्म धातुओं को पुन देखें, पृथक पृथक अणु मिश्रित पेखें।

जो मिलते वे सब अलगाएं, अलग होय अरु मिलते जायें।

प्रश्न

नहीं अनादि ईश्वर कोई, जो रचता संसार।

यही जीव सर्वज्ञ हो, बन जाता कर्तार।।

जीव करे जब योगाभ्यासा, मन की मैल होय सब नासा।

अणिमा गरिमा महिमा पावे, तब सर्वज्ञ ब्रह्म हो जावे।

उत्तर

जो अनादि प्रभु जगत का, होय न रचने हार।

कौन जुटाता जीव हित, साधन सिद्धि आधार।।

जीवहिं जीवन तनु अमोलक, प्रभु ने दीन्हे इन्द्रिय गोलक।

इन के बिना योग नहीं सम्भव, बिन शरीर अभया असम्भव।

चहे जीव सिद्ध हो कैसा, हों सकता नहीं ईश्वर जैसा।

ईश अनादि स्वयं सनातन, बल अनन्त युत पुरुष पुरातन।

कितना बढ़े जीव को ज्ञाना, फिर भी नहीं भगवान समाना।

प्रभु अनन्त समरथ का स्वामी, प्रभु सर्वज्ञ पूर्ण हित कामी।

परिमित होय जीव को ज्ञाना, अपरम्पार महिम भगवाना।

बदल सके जो सृष्टि को, ऐसा योगी नांहि।

हुआ न होगा हो सके, प्रभु की सृष्टि मांहि।।

लखें नयन अरु देखें कानन, नासा खाये सूंधे आनन।

क्रम विरुद्ध कर सका न कोई, जोगी जती न ऐसा होई।

प्रश्न

कल्प कल्प में प्रभु रचे, नये नये संसार।

वे सब होते एक से, अथवा विविध प्रकार।।

उत्तर

जैसी सृष्टि आज है, वैसी ही थी पूर्व।

इक समान जग रचत है, वस्तु न कोई अपूर्व।।

सूर्याचन्द्रमसौं धाता यथापूर्वंमकल्पयत्।

दिवै च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः।।

                        – ऋ० म० १० । सू० १९० । मं० ३

सूर्य चन्द्र विद्युत अरु तारे, जिस विधि पूर्व बनाये सारे।

जैसी पहले भूमि बनाई, वैसी ही पुन फेर रचाई।

वैसा ही जग फेर बनावे, इसमें कोऊ अन्तर नहीं आवे।

प्रभु के भूल चूक बिन कर्मा, इक सम सब जगतों के धर्मा।

भूल चूक जीवों में मानी, वे अल्पज्ञ और अज्ञानी।

प्रभु कारज जैसे के तैसे, जैसे पहले अब भी वैसे।

परमातम पूरण भगवाना, घटे बढ़े नहीं वाको ज्ञाना।

प्रश्न

सृष्टि विषय में वेद अरु, शास्त्र रखें अविरोध।

इक समान अथवा सभी, वर्णहिं बिना विरोध।।

उत्तर

वेद शास्त्र वर्णत सभी, सृष्टि विषय समान।

नहीं विरोध इस में कछु, जानत हैं मतिमान।।

तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाश५ सम्भूतः। आकाशाद्वायुः।

वायोरग्निः। अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी। पृथिव्या ओषधयः।

ओषधिभ्योऽन्नम्। अन्नाद्रेतः। रेतसः पुरुषः। स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः।।

                        – तैत्तिरीय० ब्रह्मानन्दवल्ली अनु० १

पारब्रह्म अरु प्रकृति, संग्रह करें आकाश।

फैल रहा था पूर्व जो, वही बना अवकाश।।

बिन आकाश कहँ प्रकृति वासा, तांते जन्मे नहीं आकासा।

पुन आकाश के पाछे पवना, तिस पाछे अग्नि को सवना।

अग्नि अनन्तर जल की वृष्अि, जल पाछे भूमि की सृष्टि।

भूमि औषधियाँ उपजावे, औषध बाद अन्न सरसावे।

बने अन्न से वीर्य अनन्तर, वीर्य बनावे पुरुष निरन्तर।

आकाशादिक क्रम से सृष्अि, तैत्तिरीय की अस विध दृष्टि।

छान्दोग्य अग्नि क्रम भाखे, ऐतरेय क्रम जल का राथे।

हिरण्यगर्भ सों वेद उचारे, कहीं पुरुष से सृष्टि पसारे।

मीमांसा कर्मों से माने, वैशेषिक कालहु ते जाने।

परमाणु ते न्याय बखानत, पुरषारथ से योग वितानत।

प्रकृति सांख्य मानता कारण, ब्रह्म रचे वेदान्त निधारण।

किसका कथन सत्य में माने, मिथ्या किसका कहना जाने।

उत्तर

झूठ न कोई सब ही सांचे, झूठ कहें सो मति के कांचे।

प्रभु निमित्त कारण जग केरा, ब्रह्म गुरु अरु सब जग चेरा।

उपादान है प्रकृति कारण, शास्त्र करें एहि विधि अवधारण।

महा प्रलय जब हो संसारे, तब आकाश हो जगत प्रसारे।

जब नभ पवन प्रलय नहीं पाते, शेष अग्नि आदि बिनसाते।

तब अग्नि से सृष्टि प्रसारा, होता विविध वर्ण संसारा।

जब अग्नि का होय विनाशा, जल से हो पुन सृष्टि विकासा।

हिरण्यगर्भ अरु पुरुष का, कर दीना विख्यान।

समुल्लास पहला पढ़ें, कीना वहां बखान।।

यह सब है ईश्वर के नामा, नहीं विरोध के दर्शन धामा।

एकहु पर द्वै सम्मति पायें, वहाँ विरोधी भाव कहावें।

छः दर्शन मंह नहीं विरोधा, पृथक विषय सबमें अनुरोधा।

मीमाँसा में वर्णन कीना, जग रचना का यूं क्रम दीना।

जग में ऐसा कार्य न कोई, कर्म चेष्टा जहाँ न होई।

समय लगे बिन रचना नाहीं, यह वर्णन वैशेषिक माँही।

उपादान बिन सृष्टि असम्भव, न्याय शास्त्र अस माने संभव।

योग कहे बिन ज्ञान विचारा, रचा न जाये यह संसारा।

जल लग होय न तत्त्व संघाता, तब लग जग बनने नहीं पाता।

सांख्य शास्त्र मत ऐसा माने, तत्त्व मिलन से सृष्टि जाने।

जब लौं नहीं बनाने वाला, बनता नहीं जगत तेहि काला।

एहि विधि रचना के छः कार, ऋषियों ने कीने निर्धारण।

एक शासस्त्र वर्णहि इक कारण, इस प्रकार कीजे अवधारण।

छः जन ज्यों मिल छपर उठायें, किसी भीति के ऊपर छायें।

छः दर्शन मिल भूरी भूरी, सृष्टि कार्य की व्याख्या पूरी।

आज कल्ह के जो विद्वाना, आर्ष ग्रन्थ कारण न जाना।

प्राकृत के कुछ ग्रन्थ नवीना, पढ़े बुद्धि के चक्षु हीना।

इस दूसर की निन्दा करते, क्षुद्र बुद्धि मूरख सम लरते।

इन पर घटती एक कहावत, गज पर बैठा एक महावत।

इतने में कुछ अन्धे आये, हाथी सों निज हाथ छुवाये।

इक बोला यह खम्भ समाना, दूसर बोला छाज विताना।

मूसल सम तीजे ने बोला, चौथा कहे पालकी डोला।

इत्यादि उन अन्ध समना, आज कल्ह के हैं विद्वाना।

यह स्वारथि इन्द्रिय आरामी, अल्प ज्ञानी आतम कामी।

इन की लीला जग संहारक, दुनिया ठगते धूर्त प्रतारक।

प्रश्न

कारण बिन नहीं कार्य जब, होता सृष्टि मांहि।

क्यों कारण को मानते, कारण होवे नांहि।।

उत्तर

काम न लेते बुद्धि से, अनपढ़ नर अनजान।

दोऊ पदारथ सृष्टि में, कारण कारज जान।।

कारण कबहुं न होवे कारज, वेद शास्त्र सब मानहिं आरज।

जिस नर को नहीं सृष्अि ज्ञाना, वह कया जान सके अनजाना।

नित्यायाः सत्वरजस्तमसां साम्यावस्थायाः प्रकृतेरुत्पन्नानां

परमसूक्ष्माणां पृथक् पृथग्वर्त्तमानानां तत्त्वपरमाणूनां प्रथमः

संयोगारम्भः संयोगविशेषादवस्थान्तरस्य स्थूलाकारप्राप्तिः सृष्टिरुच्यते।।

कुण्डलिया

नित्य अनादि प्रकृति, कारण जगत स्वरूप।

सत रज तम इन गुणों की, एक अवस्था रूप।।

एक अवस्था रूप, प्रकृति से उत्पन तत्त्वा।

परम सूक्ष्म पर बिखर रहे थे सो महतत्त्वा।।

उनका प्रथम संयोग करे पुन आगे विकृति।

स्थूल जगत इमि रचती, नित्य अनादि प्रकृति।।

तांते जब होवे संसर्गा, तब होवे सृष्टि को सर्गा।

प्रथम संयोगे जो मिल जावे, पुन औरों को संग मिलावे।

जो संजोग के आदि पदारथ, अरु वियोग के अन्त कृतारथ।

जा को नहीं अर्थात् विभाजन, वह जानो कारण सब काजन।

जो संजोग के बने अनन्तर, तद्वत रहे न प्रलयानन्तर।

वह पदार्थ पुन कार्य कहावें, यह सिद्धान्त शास्त्र समझावें।

जो पूछे कारण का कारण, कारज का कारज निर्धारण।

कर्त्ता का पूछे पुन कर्त्ता, अरु साधन का साधन धर्त्ता।

कहे साध्य का साध्य कुबुद्धि, वह मूरख जानों दुर्बुद्धि।

वह अन्धा आंखों के होते, सूख गये बुद्धि के सोते।

बहिरा है यद्यपि हैं काना, महा मूढ़ यद्यपि विद्वाना।

क्या दीपक का देखा दीपक, कहाँ सूर्य का सूर्य प्रदीपक।

आंखों की आंखें क्या सम्भव, मूरख बकते बात असम्भव।

जो जिससे है उत्पन होता, वह कारण कारज को स्त्रोता।

जो वस्तु पुन उत्पन्न होई, कार्य कहावे वस्तु सोई।

जो कारण को कार्य बनावे, कर्ता सोई पदार्थ कहावे।

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।

उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः।।

                              – भगवद्गीता अ० २ । १६

कबहुँ असत का होय न भावा, सत का कबहुँ न होत अभावा।

इस को जानहिं तत्त्व ज्ञानी, क्या जानें मूरख अभिमानी।

जो नहीं पठित और सत्संगी, पड़ा रहे भ्रम कूप कुसंगी।

धन्य धन्य हैं वे नर ज्ञानी, सगरी विद्याएं जिन जानी।

करें परिश्रम ज्ञान बढ़ावें, औरों के हित मार्ग दिखावें।

बिन कारण जो मानहिं सृष्टि; उनकी मानों फूटी दृष्टि।

जब आवे रचना को काला, रचना रचते दीन दयाला।

परम सूक्ष्म जो रहें पदारथ, पृथक् पृथक् थे पड़े अकारथ।

उनका संग्रह करता ईश्वर, जग आरम्भे यूं जगदीश्वर।

संग्रह से कछु होवे स्थूला, वही द्रव्य सृष्टि को मूला।

महत्तत्त्व है संज्ञा वाकी, जिससे चलती सृष्टि बाकी।

महत्तत्त्व से स्थूल पदारथ, अहंकार तेहि नाम सकारथ।

अहंकार से पंच तनमात्रा, दश इन्द्रिय मन ग्यारह मात्रा।

इन का क्रम से होत विकासा, पंचभूत पुन होंय प्रकासा।

पंचभूत सब के प्रत्यक्षा, इन्द्रिय के नित रहें समक्षा।

उनसे नाना पेड़ लताएं, अन्न फेर ईश्वर उपजाएं।

अन्न खाय पुन वीरज जनमें, वीरज बदले पुन नर तन में।

बिन मैथुन आदिम संसारा, ईश्वर मिथुन बनाने हारा।

नर नारी तनु प्रभु बनाये, उनके अन्दर जीव मिलाए।

ऐसे रचा प्रथम संसारा, पाछे चली मैथुनी धारा।

देखो तनु कैसे रचा, अहो पूर्ण विज्ञान।

मुख में अंगुरी डार कर, चकित खड़े विद्वान।।

अस्थि जोड़ और नाड़ी बन्धन, मज्जा मांस हृदय का स्ंपदन।

त्वचावरण यकृत् अरु प्लीहा, नासा कर्ण वदन अरु जीहा।

जीव देह सुन्दर सम्मेलन, कैसे प्रभु के खेल सुखेलन।

शिर का मूल चरण की शाखा, मनहं पेड़ उल्टा कर राखा।

जागृत स्वप्न सुषुप्ति स्थाना, भोगे भोग जीव जँह नाना।

केती करूं प्रभु की उपमा, कैसी रचना सुघड़ अनुपमा।

बिन ईश्वर अस कौन रचाए, ऐसे प्रभु को शीश निवाए।

अहह! भूमि रत्नों की खाना, क्षुद्र बीज सों पेड़ महाना।

हरित श्वेत पीले अरु काले, सुरुचि सुगन्धित फूल निराले।

पत्र पुष्प अरु फल फुलवारी, श्वास श्वास प्रभु के बलिहारी।

कटु कषाय बहु मीठे खरे, षट्रस स्वादु पदारथ न्यारे।

कोटि कोटि अद्भुत भूगोला, निराधार पुन एक न डोला।

सूर्य चन्द्र बहु लोक रचाये, किस विध धारे गगन घुमाए।

चलें सभी मर्यादा मांही, बिन आज्ञा कोऊ डोले नाहीं।

देखें कोई वस्तु जभी, द्वैविध होवे ज्ञान।

इक वस्तु जिसने रची, इक वस्तु का भान।।

लखा किसी ने जैसे भूषण, सोने का दमके निर्दूषण।

मुख से निकसे धन्य सुनारा, इस भूषण का घड़ने हारा।

प्रश्न

भूम्यादिक पहले बने, अथवा नर संसार।

या को उत्तर दीजिये, समझ सोच निर्धार।।

उत्तर

भूम्यादिक पहले बने, पाछे नर संसार।

बिना ठौर कँह मनुष की, होती स्थिति विचार।।

प्रश्न

कहो सृष्टि के आदि में, जन्मे मनुष अनेक।

एक पुरुष अथवा हुआ, अथवा कुछ अतिरेक।।

उत्तर

अनिक मानव आदि में जनमें, रूप रंग नाना नर तन में।

जो जन थे पूरब सत्कर्मी, निर्मल हृदय भक्त अरु धर्मी।

आदिक में उनको उपजाया, उन को दीनी निर्मल काया।

‘मनुष्या ऋषयश्च ये’।। ‘ततो मनुष्या अजायन्त’।।       – यजुर्वेद

यजुर्वेद को है यह वचना, आदि काल निजकी भई रचना।

सिद्ध करे यह वेद प्रमाना, आदि सृष्टि मानुष भये नाना।

सहस सहस मानुष उपजाए, सुन्दर नाना वर्ण सुहाए।

जन जन का अब रूप न एका, तांते जननी जनक अनेका।

इक से इक का मिले न रंगा, विविध वरण आकार सुरंगा।

एकहु की यदि हों सन्ताना, रूप रेख क्यों होते नाना।

प्रश्न

जो जन्मे वे तरुण थे, अथवा बूढ़े बाल।

अथवा तीनों भांति के, जन्मे आदि काल।

उत्तर

जो जन्मे वे तरुण थे, नहीं वृद्ध नहीं बाल।

जो कहीं बालक जन्मते, करता कौन संभाल।।

यदि प्रभु बुढ़े ही जन्माते, वे निर्वीर्य न सृष्टि चलाते।

निर्बल मैथुन के असमर्था, सन्तति चले न बिना समर्था।

मिथुन सृष्अि आगे नहीं चलती, अचिरहि काल गाल में गलती।

तांते तरुण सृष्टि उपजाई, जिस ते आगे सृष्टि चलाई।

प्रश्न

क्या सृष्टि का होत है, कभी आरम्भ बताव।

कब आरंभ इसका हुआ, कब यह पुनः नशाव।।

उत्तर

सृष्टि का आरंभ नहीं, नहीं इसका अवसान।

सृष्टि प्रलय होते रहें, दिन अरु रात सान।।

ब्रह्म जीव अरु जग का कारण, तीन अनादि कर अवधारण।

वर्तमान स्थिति उत्पति तीनों, हैं अनादि पुन नाश विहीनो।

नद प्रवाद जिमि चले अनादि, उसका दीखे अन्त न आदि।

कबहुं शुष्क कबहुं सरसावे, गर्मी वर्षा घट बढ़ जावे।

नित्य प्रवाह रूप संसारा, कभी न बनने मिटने हारा।

ज्यों प्रभु के गुण कर्म स्वभावा, आदि अन्त इनके नहीं पावा।

उत्पति थिति प्रलय भी बाकी, आद रु इति नहीं होवे ताकी।

प्रश्न

पक्षपात प्रभु ने किया, नाना योनि बनाय।

कोई पशु पंछी कोई नर, कोई घोड़ा कोई गाय।।

सिंह कोऊ और कोऊ गैय्या, भोज्य कोऊ अरु कोऊ खवैया।

केते जीवहिं वृक्ष बना कर, अगणित कीट पतंग रचा कर।

पक्षपात ईश्वर ने कीना, बिन अपराध उन्ह दुख दीना।

उत्तर

पक्षपात नहीं प्रभु करे, कर्मों का फल देत।

पूर्व सृष्टि जो जिस किया, वैसी योनि लेत।।

प्रश्न

मानव सृष्टि आदि में, उत्पन्न भई किस ठाम।

कौन देश क्या नाम था, कौन नगर को गाम।।

उत्तर

भई त्रिविष्टप देश मँह, तिब्बत जाको नाम।

सब से सुन्दर जगत में, सब से ऊँचा धाम।।

प्रश्न

आदि सृष्टि में मनुष की, क्या जाति थी एक।

अथवा नाना जातियां, आरज दस्यु अनेक।।

उत्तर

एक जाति थी मनुष की, अनिक भईं पश्चात्।

आर्य कहाते भले जन, दस्यु करें उत्पात।।

आर्य देव विद्वान कहाये, दुष्ट दस्यु डाकू कहलाये।

चार भेद आरज के जानो, कर्म वर्ण का भेदक मानो।

ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य जघन्या, आदि तीन द्विज शूदर अन्या।

अनपढ़ मूरख शूद्र कहावे, सब से छोटी पदवी पावे।

प्रश्न

तिब्बत से इस भूमि पर, आये कौन प्रकार।

किस कारण नीचे बसे, तज कर उच्छ पहार।।

उत्तर

जब नित नित होने लगा, आर्य दस्यु संग्राम।

तब आरज इत आ बसे, आर्यवर्त भया नाम।।

भूमण्डल मँह यह सर्वोंत्तम, यही देश गुणयुत परमोत्तमम।

यह भूखण्ड भूमि को सारा, मानत स्वर्ग जिसे संसारा।

आर्य जनों ने इसे बसाया, तांते आर्यावर्त कहाया।

प्रश्न

कितना आर्यावर्त है, कँह इसकी मरयाद।

उत्तर दक्षि कहां तक, कहां अंत कहां आद।।

उत्तर

आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात्।

तयोरेवान्तरं गिर्योंरार्य्यावर्त्तं विदुर्बुधाः।।१।।

सरस्वतीदृषद्वत्योर्देंवनद्योर्यदन्तरम्।

तं देवनिर्मितं देशमार्यावर्त्तं प्रचक्षते।।२।।          – मनु० २ । २२ । १७

उत्तर मँह गिरि उच्च हिमाचल, दक्षिण में सोहे विंध्याचल।

पूरब पश्चिम द्वै दिश सागर, आर्यवर्त यह देश उजागर।

सरस्वती पश्चिम मँह बहती, अटक जिसे अब दुनिया कहती।

दृष्टद्वती पूरब दिग्वहिनी, वेगवती गहरी जल गहिनी।

नयपालहुं पूरब से निकसे, बंग आसाम पूर्व जा विकसे।

मिले जाय दक्षिण सागर में, दक्षिण भारत रत्नागिर में।

ब्रह्म देश के पश्चिम ओरा, सागर मिली रोर कर घोरा।

ब्रह्म पुत्र जा को अब नामा, गहन गभीर नीर अभिरामा।

हिम गिरि मध्य रेख से दक्षिण, गिरि माला कर रही प्रदक्षिण।

विन्ध्याचल के यावत देशा, रामेश्वर तक सभी प्रदेशा।

आर्यवर्त यह देश कहाया, आर्य जाति ने इसे बसाया।

प्रश्न

जब तक आर्य न बसे थे, इस भूमि पर आय।

कौन बसे थे देश में, कौनहु देश कहाय।।

उत्तर

जब लग आर्य यहां नहीं आए, निर्जन घन बन थे यहा छाये।

रहा न इसका कोई नामा, नहीं मानुष मानुष को ठामा।

तिब्बत से आरज ही आये, उन ही ने यह देश बसाये।

प्रश्न

कछुक लोग ईरान से, आएं आर्य बतांय।

एहि कारण इस देश के, आरज लोक कहांय।।

जांगल यहां के आदिम वासी, राक्षस असुर क्रूरता रासी।

आर्य कहें अपने को देवा, असुरन बांध कराते सेवा।

चिर कालिक चला रहा, देवासुर संग्राम।

राक्षसहूं को मार पुन, कियो आर्य निज धाम।।

उत्तर

वि जानीह्यार्यान ये च दस्यवो बर्हिष्मते रन्धया शासदव्रतान्।।

                        – ऋ० म० १ । सू० ५१ । मं० ८

उत शूद्र उतार्ये।।                 – अथर्व० का० १९ । ६२

सज्जन को आरज कहें, दस्यु दुष्टन नाम।

दोनों आदिम सृष्टि मंह, रहते तिब्बत धाम।।

क्षत्रिय वैश्यरु ब्राह्मण आरज, विरहित विद्या शूद्र अनारज।

सन्मुख सत्य वेद की वानी, परदेसिन की झूठ कहानी।

यह परदेशी ठीक न जानें, बुद्धिमान इनकी नहीं मानें।

देवासुर संग्राम कहानी, इन को जानत हैं सब ज्ञानी।

हिम पर्वत पर भईं लड़ाई, देव दस्यु तहँ रार बढ़ाई।

इत से अर्जुन गये सहाई, राक्षस सेना मार गिराई।

राजा दशरथ भी उत गौने, मारे जिम नाहर मृग छौने।

असुर मार देवन कँह राखा, आर्य जाति की राखी साखा।

बाहर आर्यावर्त के, जेते चारों कूँट।

असुर लोग रहते रहे, इस में तनिक न झूँट।।

हिम गिरि पर जब करें चढ़ाई, देव असुर की होत लड़ाई।

तब तब यहां के आर्य नरेशा, प्रायः जाते उत्तर देशा।

आर्य जाति की करें सहाया, असुर सैन्य बहु बेर गिराया।

रावण राम हुआ संग्रामा, देवासुर नहीं वाको नामा।

रावण राम युद्ध कहें वाको, अथवा राक्षस आरज ताको।

नहीं संस्कृत पुस्तक कोई, नहीं कोई इतिहास।

जिस में आरज जाति का लिखा ईरान निवास।।

ऐसा लिखा कहीं नहीं पायें, लिखा कहीं तो हमें दिखाएं।

आरज थे पहले ईरानी, झूठ सर्वथा गप्प कहानी।

वहां से चल कर यहां पर आये, इत के जाग्ङल मार भगाये।

स्थापित कीना अपना शासन, संस्कृत भाषा लागे भासन।

परदेसी बुद्धि के हीता, लिखते रहें वेद विपरीता।

आर्यवाचो म्लेच्छवाचः सर्वे ते दस्यवः स्मृताः।।१।।

                                    – मनु० १० । ४५

म्लेच्छदेशस्त्वतः परः ।।२।।             – मनु० २ । २३

आर्यावर्त देश इक आरज, दस्यु शेष मलेच्छ अनारज।

जे ईशाण कोण के देशा, उत्तर अरु वायव्य प्रदेशा।

वे सब असुर मलेच्छ कहावें, दस्यु लूट मार कर खावें।

जे नैर्वृत्य कोण के वासी, आगनेय दक्षिण परवासी।

ते प्रसिद्ध राक्षस के नामा, हबशी रूप भयंकर कामा।

आजहु उनकी वैसी सूरत, वही कुरूप भयानक मूरत।

आय्रवर्त के चरणों तल में, दूर शान्त सागर के जल में।

सुन्दर नाग नरों का वासा, जिन का देश पाताल प्रवासा।

नाग नाम नरपति के जाये, नाग वंश तांते कहलाये।

सुघर उलूपी सुन्दर नारी, उसी देश की राजकुमारी।

अर्जुन से जिस कीन विवाहा, वर पाया क्षत्रिय मन चाहा।

इक्ष्वाकु महाराज से, कुरु पाण्डव पर्यन्त।

आर्य नृपों का राज था, जग पर दशहुं दिगन्त।।

द्वापर तक सगरा संसारा, था सर्वत्र वेद परचारा।

आर्यावर्त बसाने हारे, प्रथम नरेश ख्यात संसारे।

ब्रह्म सुत विराट महाराज, वाको बेटा मनु विराजा।

मारीच्यादिक मनु के जाये, सात स्वायंभव तिन उपजाये।

इक्ष्वाकु उनकी सन्ताना, बड़ो भूप पृथिवी को माना।

हम हत भागी भाग्य हमारे, आय्र आलसी भये नकारे।

पतित प्रमादी विषय विलासी, लड़े परस्पर सत्यानासी।

निज कर से सब देश गंवाये, अब बैठे निज हाथ बंधाये।

नहीं राज्य अपना कहीं, निर्भय और स्वतन्त्र।

जकड़ बँधे दासत्व से, पढ़े फूट का मन्त्र।

पादाक्रान्त भया सब भारत, हिल डुल सके न दुखिया आरत।

कछु थोड़े से नृप स्वाधीना, शेष देश सब दुर्बल दीना।

जब काहू के दुर्दिन आते, तव ऐसे दुस्सह दुख पाते।

कोई कितना चाहे करे, पर उत्तम निज राज।

निज शासन से होत है, सुखिया देश समाज।।

प्रतिभा वान विदेशी राजा, भलेहि करे कितना शुभ काजा।

मत मतान्त आग्रह नहीं राखे, न्याय करे मृदु बानी भाखे।

परम दयालु अरु श्रद्धालु, मात पिता सम होय कृपालु।

निज पर पक्षपात से हीना, राजनीति में चतुर प्रवीना।

सुखद सुशील गुणों में बेसी, परदेसी फिर भी परदेसी।

निज सम नहीं पूरण सुखदायक, निज सुखदायक पर दुखदायक।

भाषा भूषा शिक्षक वेशा, पृथक पृथक जब लग इह देशा।

तब लग हो न सके उपकारा, अति दुष्कर है देश सुधारा।

तांते वेद शास्त्र इतिहासा, उन में जो कछु सत्य प्रकासा।

उन पर चलिये उन को मानें, उस में भारत का हित जानें।

प्रश्न

सृष्टि के उत्पन्न हुए, बीता कितना काल।

कितने युग कितने मनु, कितने संमत साल।।

उत्तर

एक अर्ब छः नवति कोट, वर्ष सहस कई लक्ष।

जग की उत्पत्ति भई, भये वेद प्रत्यक्ष।।

भाष्य भूमिका मोर बनाई, उस में यह सब दिया बताई।

कटे न जो पुन सो परमाणु, सट परमाणु का एकाणु।

दो अणुओं का द्व्यणुक कहावे, हो कछु स्थूल वायु उड़ पावे।

तीन द्व्यणुक की पृथिवी बनती, इस के आगे सृष्टि वितनती।

तीन द्वयणुक त्रसरेणु कहिये, दो त्रसरेणु पृथिवी गहिये।

भूमि बने ते दृश्य पदारथ, दृष्टि गोचर होंय यथारथ।

एहि विधि क्रम से जगत बनाया, ईश्वर ने भूगोल रचाया।

प्रश्न

कौन करे धारण इसे, यह अपार भूगोल।

किसके आश्रय पर खड़ा, तनिक सके नहीं डोल।।

सहस फणि के फण के ऊपर, शेषनाग कहें जाको भूपर।

बैल ८ाृंग पर पृथिवी धारे, कोई कहता है पवन सहारे।

रवि के आकर्षण से ठाड़ी, रश्मिन सों घूमत ज्यों गाड़ी।

कहें एक यह भूमि भारी, तले तले गिर रही वेचारी।

किसका कथन सत्य हम जानें, किसकी बातें मिथ्या मानें।

उत्तर

सर्प वृषभ पर जो कहें, उन से पूछें बात।

कौन शेष का पिता था, कौन वृषभ की मात।।

सर्प बैल ठाड़े हैं किस पर, कहां भूमि है बैठे जिस पर।

मात पिता जब उनके जन में, किसपर खड़ी भूमि तिस छन में।

मुसलमान बैलहु पर माने, वे तो चुप हो लम्बी तानें।

पर जो मानें सर्प आधारे, वह यह उतर देंगे न्यारे।

कच्छप के हैं शेष सहारे, कच्छप तिरता सागर खारे।

अग्नि ऊपर अंबु तरता, वायु पुन पानी को धरता।

वायु पुन रहता आकाशे, इस प्रकाश भूगोल प्रकाशे।

इस सारे को कौन उठाएं, इस का उत्तर मुझे बताएं।

इस का एकहि उत्तर भाई, पारब्रह्म ने सृष्टि उठाई।

जब उन से यह पूछा जाये, शेष नाग हैं किस के जाये।

देंगे उत्तर तभी तुरन्ता, कश्यप कद्रु के बलवन्ता।

बैल गाय से होवे उत्पन्न, यह जाने सृष्टि का जन जन।

कश्यप सुत मरीचि का जाया, मनु ने पुत्र मरीची पाया।

मनु विराट का पुत्र सुहाया ताको ब्रह्मा ने उपजाया।

आदि सृष्टि का ब्रह्म जानो, आदि पुरुष ब्रह्मा को मानो।

पीढ़ी पाँच शेष ते आगे, वे कँह धरते पाँव अभागे।

तब वह पृथिवी कहाँ खड़ी थी, किस खूँटी के साथ गड़ी थी।

कश्यप जनमें थे जिस काला, को था धारण करने वाला।

होंय निरुत्तर लड़ने लागें, सिर धर पाँव क्रोध कर भागें।

सत्य अर्थ इन को समझाऊँ, सब रहस्य कर खोल बताऊँ।

‘शेष’ कहें जो रहता बाकी, वह बाकी है सृष्टि जाकी।

प्रलय होय जब जगत विनाशे, शेष ब्रह्म केवल परकाशे।

वही शेष पूरन परमातम, जगदाधार जगत का आतम।

अर्थ शेष का इन हीं जाना, साँप सहारा भू का माना।

सत्येनोत्तभिता भूमिः।।                       -ऋग्वेद १० । ८५ । १

सत्य रूप अविनाशी ईशा, धारण करता मही महीशा।

लोक लोकान्तर कर्ता हर्ता, वही ब्रह्म महि मण्डल धर्ता।

उक्षा दाधार पृथिवीमुत द्याम्।।                       – ऋग्वेद

‘उक्षा’ पद को देख कर, लिया बैल को मान।

बैल न भूमि धर सके, इतना भी नहीं ज्ञान।

कहां बैल कहां जगत अपारा, गिरि सागर मय गोलक भारा।

बैल न इतना भार उठाये, इतनी समरथ कहां से लाये।

उक्षा संज्ञा है दिनकर की, वर्षा से जिस भूमि तर की।

आकर्षण से पृथिवी धारे, यूं पृथिवी है सूर्य्य सहारे।

पर सूरज आदिक का धर्त्ता, केवल ब्रह्म जगत का कर्त्ता।।

प्रश्न

परमेश्वर धारण करे, कैसे यह भूगोल।

कंपित हो उसकी भुजा, पृथिवी जावे डोल।।

उत्तर

इस अनन्त आकाश के, सन्मुख यह भूगोल।

है हिमगिरि के सामने, परमाणु के तोल।।

कहाँ जलधि कहां विन्दु नीरा, कहाँ फूँक कहाँ प्रलय समीरा।

इक विन्दु सम यह संसारा, पारब्रह्म वह अपर अपारा।।

बाहर भीतर व्यापक ईश्वर, जगत करे धारण जगदीश्वर।

इक देशी जिमि कहें किरानी, सतम नीा पर गनहि कुरानी।

नर स्वरूप में लखें पुरानी, प्रभु महिमा इनने नहीं जानी।

यदि होता इक देशी कर्त्ता, महा असंभव पृथिवी धर्त्ता।

जो नहीं जिस वस्तु तक व्यापक, हो न सके वह उसका प्रापक।

प्राप्ति हीन कैसे पुन धारे, प्रापति से ही मिलें सहारे।

जो तुम कहो आकर्षण कारण, आकर्षण करता है धारण।

सूर्य्य चन्द्र भूमि ग्रह तारे, इक दूसर को खैंचन हारे।

नहीं अपेक्षा प्रभु की राखें, इसका उत्तर हम यह भाखें।

क्या यह सृष्टि सान्त है, अथवा गनहु अनन्त।

जो अनन्त इसको गनहु, क्या होवे पुन अन्त।।

जिस वस्तु का हो आकारा, सो अनन्त नहीं किसी प्रकारा।

सान्त कहो यदि यह संसारा, अन्त होय जहँ जगत किनारा।

जिसके परे लोक कोउ नाहीं, शून्य बिना कछु दीखत नाहीं।

वहाँ किसका आकर्षण मानो, कोन खेंच रखता अनुमानो।

सब गोलों की एक समष्टि, पृथक पृथक हों व्यष्टि व्यष्टि।

किसने जगत समूचा धारा, प्रभु बिन नहीं कोई आधारा।

स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमाम्।।           – यजु० अ० १३ मं० ४

जिनमें नहीं प्रकाश है, भूम्यादिक ते लोक।

अरु रवि आदि प्रकाशमय,धारत प्रभु विलोक।।

पारब्रह्म व्यापक प्रभु मेरा, जिसने जगत समूचा घेरा।

वही जगत का कारक धारक, पारब्रह्म प्यारा उपकारक।

प्रश्न

क्या यह सगरे घूमते, पृथिवी आदिक लोक।

अथवा जँह के तँह खड़े, इन्हें रखे को रोक।।

उत्तर

सुनहु मित्र है घूमता, यह सगरा संसार।

रविशशि भूमि नखत सब, सगरे घूमन हार।

प्रश्न

कुछ कहते भू भ्रमत हैं, अरु रवि घूमत नांहि।

कुछ रवि घूमत मानते, को सत इनके मांहि।

उत्तर

इन दोनों की मिथ्या बानी, सत्य बात एकहु नहीं जानी।

नहीं वेद का इनको ज्ञाना, ताँते तथ्य नहीं पहिचाना।

आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः। पितरं च प्रयन्त्स्वंः।।

                                    – यजुः० अ० ३। मं०

सजल भूमि रवि के चहुं ओरा, घूमत रहे रेन अरुभोरा।

प्रभु प्रतिष्ठित भ्रमती धरती, एकहु छिन भी नहीं ठहरती।

आ कृष्णेन रजसा वर्त्तंमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च।

हिरण्ययैन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्।।

                              – यजुः०। अ० ३३। मं० ४३

यह सूरज वर्षा का कर्त्ता, तेजोमय रश्मि गुण धर्ता।

सुन्दर रूपवान परकाशक, सकल सकल मूर्तिमय जगत विकाशक।

जग पर अमृत वर्षा कारक, रोग शोक व्याधि अपहारक।

नित निज पीरधि में है भ्रमता, रश्मि रज्जुसों सब से रमता।

काहू के चहुं ओर न घूमे, निज परिधि में रूम विरूमे।

एक एक ब्रह्माण्ड में, सूर्य्य प्रकाशक एक।

लोक लोकान्तर हैं जिते, तिते प्रकाश्य अनेक।

दिवि सोमो अधि श्रितः।।          -अथर्व० कां० १४ । अनु० १ । मं० १

चन्द्र लाक जिमि सूर्य्य प्रकाशित, भूम्यादिक तिमि सूर्य्य प्रभासित।

नितय रहें पुन दिन अम्राता, कभी साँझ अरु कभी प्रभाता।

उसी खंड में दिन हो जावे, जो पुन रवि के सन्मुख आवे।

पृष्ठ भाग में यावत खंडा, अँधियारा तावत ब्रह्मंडा।

वहाँ दिवस जँह रवि उजियारा, वहाँ रैन जँह हो अँधियारा।

उदय अस्त संध्या परभाती, देश दिशान्तर सदा सुहाती।

आर्य्यावर्ते होत सवेरा, अमरीका में रैन अँधेरा।

यहाँ दिवस वहाँ रैन अँधारी, रात दिवस हों बारी बारी।

अर्ध रात्रि इत हो जेहि काला, हो मध्याहृकाल पाताला।

जो नर कहते भ्रमत दिवाकर, अचला धर्ती चले प्रभाकर।

वे सब अज्ञ बुद्धि के भोरे, ग्रह गति ज्ञान न राखें कोरे।

जो कहीं ऐसा होता भ्राता, वर्ष सहस्त्रन हों दिन राता।

‘ब्रध्ना’ नाम सूर्य्य का जाने, लाख गुना पृथिवी से माने।

कोटि कोटि कोसों का अन्तर, यदि रवि चलता रहें निरंतर।

रैन दिवस नहीं होय समापत, छा जाये पृथिवी पर आपत।

गिरि घूमे राई चहुं ओरे, कितनी देर लगे मति भोरे।

बिलम न लागे घूमत राई, इतना सोंचें मन में भाई।

यदि वसुंधरा घूमे भ्राता, यथा योग्य रहते दिन राता।

जो थिर कहते सूर्य्य को, उनका भी अज्ञान।

वे ज्योतिष नहीं जानते, ग्रह गति से अंजान।।

जो दिनेश थिरता को पाते, राशि राशि पुन कैसे जाते।

गुरु वस्तु बिन भ्रमे गगन में, कैसे ठहरे सोचें मन में।

यदि गुरु वस्तु नहीं भ्रमावे, नियत थान पर ठहर न पावे।

भूमि गिरती ही चले, जैन कहें यह बैन।

उनके मद से भंग के, बंद हुए जनु नैन।।

जंबु द्वीप पर न्यारे न्यारे, दो रवि दो शशि जैन उचारे।

यदि यह धरती जाये गिरती, नीचे नीचे जाय फिसरती।

चक्रवाल वायु का टूटे, नष्ट होय भूमि पुन फूटे।

पवन गति नहीं रहे समानी, सकल सृष्टि की होवे हानि।

जो यहाँ होते दोऊ दिवाकर, दो ही होते यहाँ निशाकर।

कृष्ण पक्ष अरु रेन न होती, सृष्टि जगती कभी न सोती।

एक भूमि पर एक निशाकर, एक भूमि मँह एक दिवाकर।

यही सत्य याही परमाना, कहें यही पंडित विद्वाना।

प्रश्न

पृथिवी तारक चंद्र अरु, गगन प्रकाशक सूर।

क्या है इनमें को बसें, उपर नीचे दूर।।

उत्तर

पृथिवी तारक आदि यह, सबके सब भूगोल।

इनमें सृष्अि बस रही, प्रभु सत्ता अनुकूल।।

एतेषु हीद सर्वं वसु हितमेते हीद सर्वं वासयन्ते तद्यदिद

सर्वं वासयन्ते तस्माद्वसव इति।।         – शत० कां० १४ । ६ । ७ । ४

वसु नाम इनका है भाई, जहाँ बस्ती सो वसु कहाई।

वसु भूमि जब बसने वाली, वसु चंद्रादिक भी नहीं खाली।

यह छोटी सी सृष्टि धर्ती, कोटि कोटि नर नार बिभर्ति।

शेष लोक क्यों होंगे खाली, वहाँ भी सृष्टि रहने वाली।

प्रभु के कारज सभी सकारथ, लोक न उसने रचे अकारथ।

सब लोकों में मानुष बसते, दुखी सुखी रोते अरु हसते।

प्रश्न

जेहि विधि यहाँ के लोग सब, रखें रूप आकार।

ऐसेहि सबके रूप हैं, अथवा भिन्न प्रकार।।

उत्तर

कुछ कुछ अन्तर आकृति माँही, अवश होय कछु संशय नाहीं।

चीन हबश अरु भारत वाले, रूप रंग में तनिक निराले।

एहि विधि जानो लोक लोकन्तर, सब में रूप रंग का अन्तर।

पर नर की जिमि यहाँ बनावट, वैसी ही सर्वंत्र मुखावट।

जँह जँह नास नैन अरु काना, सब लोकों में एक समाना।

सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्।

दिव च पृथिवी चान्तरिक्षमथो स्वः।।

                        – ऋ० । म० १०। सू० १९०। मं० ३

रवि शशि भूमि अरु आकाशा, सदा एक सा प्रभु प्रकाशा।

पूर्व काल में यथारचाये, वैसे ही इस समय बनाये।

कि९िचन्मात्र न होवे भेदा, करे बखान यही सब वेदा।

प्रश्न

ईश्वर ने हमको दिये, जैसे चारों वेद।

सब लोकों में यही हैं, अथवा है कछु भेद।।

उत्तर (सोरठा)

यही दिये प्रभु वेद, लोक और लोकान्तर में।

राजा रखे न भेद, ज्यों शासन के नियम में।

प्रश्न

जब प्रभु ने नहीं जीव बनाये, पंच तत्त्व भी नहीं रचाये।

जीव रु प्रकृति दोऊ अनादि, इन का होवे अंत न आदि।

तौ प्रभु का उन पर अधिकारा, उचित नहीं रखना अनिवारा।

है स्वायत्त स्वतंतर सारे, प्रभु इन का क्या फेर सँवारे।

उत्तर

सम कालीन प्रजा अरु राजा, नृप अधीन सब प्रजा समाजा।

ऐहि विधि जड़ प्रकृति अरु आतम, सबका शासक है परमातम।

प्रभु सृष्टि का रचने हारा, कर्मों का फल देने वारा।

वह अनन्त शक्ति का धारक, प्राणि मात्र का है प्रतिपारक।

अलप शक्ति जड़ जीव पदारथ, इनका शासक प्रभु यथारथ।

नियम माँहि सब जगत चलावे, बाहर नियम न कोई जावे।

निज कर्मों में जीव स्वतन्तर, फल पाने में है परतन्तर।

सर्व शक्तिमय कर्ता, प्रभु कर्ता धर्ता अरु हर्ता।

इति आर्य महाकवि श्री जयगोपाल विरचिते सत्यार्थप्रकाश

कवितामृते अष्टमः समुल्लासः समाप्तः।।