087 Wishwakarma Advihaya

मूल स्तुति

वि॒श्वक॑र्मा॒ विम॑ना॒ऽ आद्विहा॑या धा॒ता वि॑धा॒ता प॑र॒मोत स॒न्दृक्।

तेषा॑मि॒ष्टानि॒ समि॒षा म॑दन्ति॒ यत्रा॑ सप्तऽऋ॒षीन् प॒रऽ एक॑मा॒हुः॥४०॥

यजु॰ १७।२६

व्याख्यानहे सर्वज्ञ, सर्वरचक ईश्वर! आप “विश्व-कर्मा विविध जगदुत्पादक हो तथा “विमनाः विविध (अनन्त) विज्ञानवाले हो, तथा “आद्विहाया सर्वव्यापक और आकाशवत् निर्विकार, अक्षोभ्य, सर्वाधिकरण हैं। वही सब जगत् का “धाता धारणकर्त्ता है, “विधाता विविध विचित्र जगत् के उत्पादक है तथा “परम उत सर्वोत्कृष्ट हैं। “सन्दृक् यथावत् सबके पाप और पुण्यों को देखनेवाला है। जो मनुष्य उसी की भक्ति, उसी में विश्वास और उसी का सत्कार (पूजा) करते हैं, उसको छोड़के अन्य किसी को लेशमात्र भी नहीं मानते, उन पुरुषों को ही सब इष्ट-सुख मिलते हैं, औरों को नहीं। वह ईश्वर अपने भक्तों को सुख में ही रखता है और वे भक्त भी सम्यक् स्वेच्छापूर्वक “मदन्ति परमानन्द में ही सदा रहते हैं, कभी दुःख को नहीं प्राप्त नहीं होते। वह परमात्मा एक, अद्वितीय है, जिस परमात्मा के सामर्थ्य में “सप्त ऋषीन् लोक, अर्थात् पञ्च प्राण, अन्तःकरण और जीव ये सब प्रलयविषयक कारणभूत ही रहते हैं। वही जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय में निर्विकार आनन्दस्वरूप ही रहता है। उसी की उपासना करने से हम लोगों को सदा सुख रहता है॥४०॥