08. कुंभ मेला की जुरी है

8 श्रीमद्दयानन्द काव्यप्रकाश

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर

ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

वार्ता :- स्वामी पूर्णानंद जी से संन्यास की दीक्षा लेकर शुद्ध चैतन्य जी, स्वामी दयानंद सरस्वती नाम से विभूषित होकर संवत १९१२ में, कुंभमेला दर्शन हेतु, हरिद्वार में आते हैं। जो कुछ मेला में देखने को मिला उसका कैसा प्रभाव दयानंद जी पर पड़ता है?

राग रसिया :-

कुंभ मेला की जुरी है भारी भीड़,

लगौ है मेला सन्तन को।

दूर-दूर से भक्त आए रहे। अपनी शान दिखने को।

ऐसी संगत से भयो है मन अधीर। लगौ है मेला-(१)

भांति-भांति के साधू देखे, अलग-अलग उनके भगवान।

डुबकी लगा गंग धारा में, मांग रहे क्या-क्या वरदान।

कहते गंगा मैया हरे सबकी पीर। लगौ है मेला-(२)

धर्म-कर्म की देख दुर्दशा, मन ही मन अकुलाए हैं ।

ऐसा कैसे हुआ दयानंद समझ नहीं कुछ पाए हैं ।

भारत माता कौ हरण भयो चीर। लगौ है मेला-(३)

गंगा तट की देख गन्दगी, दयानंद मन करें विचार।

निर्मल गंगा मैली कर दई, किस विधि इसका हो उद्धार।

चंडी पर्वत पर गए धर धीर। लगौ है मेला-(४)